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Thursday, July 9, 2020

इनकम टैक्स रिटर्न फाइलिंग: FY2019-20 के लिए नए आईटीआर(ITR) फॉर्म - जानिए आपके लिए कौन सा बेहतर है।

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करदाताओं को ध्यान देना चाहिए कि वित्त वर्ष 2019-20 के लिए आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की नियत तारीख होती है , जो कि आमतौर पर 31 जुलाई होती है परन्तु सरक़ार ने  लॉकडाउन और महामारी के मद्देनज़र इसे बढ़ाकर  पहले 31 अक्टूबर की फिर , करदाता के प्रकार के आधार पर करदाताओं के सभी वर्गों के लिए 30 नवंबर, 2020 तक बढ़ा दी गई है। । एक करदाता को इसके लिए लागू आईटीआर फॉर्म भी पता होना चाहिए, जो करदाता की स्थिति, अर्जित आय की प्रकृति और सीमा सीमा पर निर्भर करता है, चाहे करदाता किसी कंपनी में निदेशक या शेयरधारक हो, आदि।

 

वित्त वर्ष 2019-20 के लिए आईटीआर फाइलिंग की प्रक्रिया को किकस्टार्ट करने के लिए, हाल ही में, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए नए रिटर्न फॉर्म अधिसूचित किए हैं। विभिन्न प्रकार के करदाताओं के लिए सात रूप, ITR-1 से ITR-7 निर्धारित किए गए हैं। यहां हम विभिन्न आईटीआर रूपों के उल्लेखनीय पहलुओं की व्याख्या करते हैं जिन्हें करदाताओं को आईटीआर दाखिल करते समय विचार करने की आवश्यकता है।

 

SARAL और SAHAJ

ITR-1 (सहज) सबसे सरल रूप में, एक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है, जिसकी कुल आय 50 लाख रुपये से अधिक नहीं है, वेतन से आय, एक घर की संपत्ति, अन्य स्रोत (ब्याज, आदि), और कृषि आय 5,000 रुपये तक।

व्यवसाय, पेशे, पूंजीगत लाभ या एक से अधिक घर की संपत्ति से आय वाले व्यक्तिगत करदाता आईटीआर -1 का उपयोग नहीं कर सकते हैं।

 

एक और सरल रूप ITR-4 (सुगम),  भारतीय निवासी व्यक्तिगत रूप से , HUF और फर्मों (LLP के अलावा) के लिए लागू होता है, जिनकी कुल आय 50 लाख रुपये तक होती है और SAD 44AD, 44ADA के प्रकल्पित आय प्रावधानों के तहत कर योग्य छोटे व्यवसाय या पेशे से आय होती है या आयकर अधिनियम, 1961 का 44AE। पूंजीगत लाभ से करदाता कर ITR-4 के लिए भी नहीं चुन सकते हैं।

 

इन दोनों सरल रूपों, अर्थात। ITR-1 और ITR-4, जिसमें न्यूनतम प्रकटीकरण आवश्यकताएं होती हैं और न्यूनतम विवरण प्रदान करने के लिए छोटे करदाताओं की आवश्यकता होती है, जो किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी लागू नहीं होते हैं जो किसी कंपनी में निदेशक है या गैर-सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों में निवेश किया है। ITR-2 उन व्यक्तियों और HUF के लिए लागू है जिनके पास व्यावसायिक आय नहीं है, लेकिन ITR 1 (सहज) के लिए पात्र नहीं हैं, जबकि ITR-3 उन व्यक्तियों और HUF के लिए लागू है, जिनके पास व्यवसाय आय है, लेकिन ITR 4 (सुगम) के लिए पात्र नहीं हैं।

 

ITR5 और अन्य फार्म

ITR-5 को व्यक्तियों और HUF (जिनके लिए ITR-1 से ITR 4 लागू है), कंपनियों (जिनके लिए ITR-6 लागू है) या धर्मार्थ ट्रस्ट / संस्थान (जिनके लिए ITR है) के अलावा अन्य सभी करदाताओं द्वारा दायर की जानी आवश्यक है। (ITR-7 लागू होता है)। इस प्रकार, ITR-5 साझेदारी फर्मों (ITR-4 के लिए अर्हता प्राप्त करने वालों के अलावा), LLPs, एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स, बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स आदि के लिए लागू होता है, जिनके लिए कोई अन्य फॉर्म लागू नहीं होता है।

वित्त वर्ष 2019-20 के लिए ITR फॉर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि Covid-19 और लॉकडाउन के कारण सरकार द्वारा प्रदान किए गए विभिन्न समयसीमा एक्सटेंशन के लाभों को शामिल करने के लिए ITR फॉर्म को संशोधित किया गया है। इस प्रकार, नए अधिसूचित आईटीआर फॉर्म में, करदाता - अनुसूची - डीआई में आवश्यक विवरणों का उल्लेख करके, वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 1 अप्रैल से 30 जून, 2020 के बीच किए गए कर बचत निवेश के संबंध में कटौती का दावा कर सकते हैं।

 

करदाताओं के पास उच्च मूल्य लेनदेन जैसे कि एक करोड़ रुपये से अधिक के चालू खाते में जमा राशि, 1 लाख रुपये या उससे अधिक का बिजली बिल भुगतान और 2 लाख रुपये और इससे अधिक की विदेश यात्रा पर खर्च करने के लिए अब आईटीआर दाखिल करने के लिए अनिवार्य है। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कुछ विवरण जैसे कि पासपोर्ट संख्या, नियोक्ता का विवरण और किराए के मकान के मामले में किरायेदारों का विवरण नए अधिसूचित रूपों से वापस ले लिया गया है, जो कि इस वर्ष जनवरी में अधिसूचित प्रपत्रों में आवश्यक थे।


💢अभी तक कर का भुगतान नहीं किया है ? तो आयकर विभाग जल्द ही आपको बुला सकता है।

आयकर विभाग के प्रधान मुख्य आयुक्त, पीके गुप्ता ने कहा कि जल्द या बाद में, आपको अपने प्रत्येक निवेश की व्याख्या करने के लिए बुलाया जाएगा।

वह आयकर अधिनियम 1961 के तहत टीडीएस और टीसीएस प्रावधानों के बारे में जागरूकता पैदा करने और सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थानों और विकास प्राधिकरणों को बकाया स्थिति से अवगत कराने पर एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

हालांकि, कर अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि किसी निर्दोष को सजा न हो। "लेकिन नागरिकों को तथ्यों को विकृत नहीं करना चाहिए या झूठे सबूत नहीं बनाना चाहिए,"

NOIDA: करों का भुगतान नहीं करना और बेहिसाब आय होने से अब कोई लाभांश नहीं देना है। आयकर विभाग ने सभी नागरिकों का एक विशाल डेटाबेस स्थापित किया है। 

कर पेशेवरों और आकलनकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि मित्रता और पेशेवर नैतिकता के बीच बहुत पतला अंतर है। ऐसा कुछ भी न करें जिसे भ्रष्टाचार के रूप में माना जा सके। सभी से मेरी अपील है कि यदि आप हमारे साथ बातचीत करते हैं, तो पेशेवर नैतिकता और प्रतिबद्धता के साथ व्यवहार करते हैं।


Tuesday, July 7, 2020

शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा जानें बाहरी दूध शिशु को कब , कैसे और क्यों पिलाये या पिलाना क्यों जरुरी है या नहीं।

Dr.P.K.Mehta
 

➕डॉ. प्रदीप कुमार मेहता (M.B.B.S., M.D.) शिशु स्वास्थ्य विज्ञान

द्वारा जाने शिशु और बाहरी दूध से सम्बंधित जरुरी बातें। 

👶मुख्य बिंदु:-

👉कटोरी चम्मच का उपयोग 

👉बोतल का उपयोग एवं सावधानियाँ 

👉बोतल क्यों और कब बंद करें

जब कभी अतिरिक्त दूध की वास्तविक आवश्यकता प्रतीत हो तो पहले माँ का दूध दें, फिर बाहरी दूध दें। शिशु की एक वर्ष की आयु तक पाउडर का दूध, गाय भैस के दूध से बेहतर विकल्प है।इसमें यह बहुत जरूरी है कि दूध बनाने में डिब्बे पर लिखे दिशा निर्देशों का पालन करे। दूध पाउडर के डिब्बे के साथ मिली चम्मच को सतह से भरकर एक चम्मच पाउडर 30 मि.ली. उबालकर ठंडे पानी में मिलाना चाहिए। इस  अनुपात का कड़ाई से पालन करना जरूरी है क्योकि इस अनुपात में पाउडर मिलाने से दूध गाढ़ा बनता ,देखकर डर सा लगता है कि छोटा शिशु इतना गाढ़ा दूध शायद न पचा सकेगा और हम अपने ध्यान में दूध की छवि के अनुरूप पतला कर देते है। माँ का दूध नैसर्गिक रूप से काफी पतला दिखता है. इससे पाउडर के गाढ़े दूध को पचाने का भय द्विगुणित हो जाता है और हम अनजाने में पानी की मात्रा बना देते है, जो उचित नहीं है। अत: निर्देशित अनुपात में दूध बनाएँ, जितना शिशु पिए, उतना पिलाएँ, बचाकर न रखें। दूध पाउडर का इस्तेमाल, पैकेट खोलने के 3 सप्ताह अथवा नियत तिथि जो भी पहले हो, के अंदर अवश्य करें।

 

प्रकृति में हर प्रजाति की दूध की संरचना उसके नवजात की आवश्यकताओं को अनुरूप निर्मित है। हम प्रकृति के संसाधनों के प्रतिरूप बनाने में अति सक्षम है परन्तु आज तक माँ के दूध की नक़ल में सफलता प्राप्त नहीं कर सके। पाउडर का दूध एक महंगा विकल्प है। यधपि गाय, भैस शिशु की प्राकृतिक माँ नहीं है लेकिन अपरिहार्य परिस्थितियों में गाय या भैंस का दूध जो शुद्ध उपलब्ध हो, यही देना चाहिए। गाय और भैस के दूध में मुख्य अंतर दूध में वसा की मात्रा है जो भैंस के दूध में गाय के दूध से अधिक होती है। सामान्यतः सभी घरों में उबालकर ठंडा  करके दूध दिया जाता है। उबालने से दूध जीटाणुरहित हो जाता है और दूध की मलाई निकल जाने से दोनों दूध की वसा की मात्रा लगभग समान हो जाती है। इस दूध में पानी न मिलाएँ। आधे पाव दूध में एक चम्मच शक्कर (100 मिली दूध में 5 ग्राम शक्कर) अवश्य मिलाएँ, इससे अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है और वसा का पाचन आसान हो जाता है। शक्कर से सर्दी होती है, कीड़े हो जाते हैं, यह भ्रान्ति है। दूध को बार बार गरम न करें, ऐसा करने से हम अपना काम बढ़ाते हैं, शाम तक दूध बहुत गाढ़ा हो जाता है जिससे दूध के पाचन में कठिनाई होती है।

जो शिशु पूर्ण रूप से बाहरी दूध पर निर्भर रहता है, यह प्रारंभिक दिनों में प्रतिदिन लगभग 500-600 मि.ली. दूध पीता है। एक माह की आयु तक यह मात्रा लगभग एक लीटर तक पहुंच जाती हैतब सामान्यतः डर लगता है कि शिशु इतना दूध पचा पाएगा या नहीं, कुछ नुकसान तो नहीं होगा। यह सोचकर अनजाने में दूध की मात्रा कम कर देते हैं। जब हम वयस्क एक लीटर दूध नहीं पी सकते तो शिशु को पिलाने में डरते हैं। यह भावना निर्मूल है क्योकि जब शिशु माँ का दूध पीता है. उसे कितनी मात्रा मिलती है. इसका अंदाज हमको नहीं हो पाता है। अतः जब तक शिशु पीता रहे, बेझिक पिलाएँ,डरे नहीं, जब उसका पेट भर जाएगा तब वह स्वाभाविक रूप से नकार देगा। पर्याप्त दूध की मात्रा मिलने पर शिशु प्रसन्नचित रहता है।

शिशु का वजन 5 माह की आयु में जन्म के समय का दुगना, एक वर्ष में तिगुना और दो वर्ष में चार गुना हो जाता है। पूरे जीवनकाल में इस गति से हमारा वजन कमी नहीं बनता है। अत: जब इतनी तेजी से वजन सकता है तो निश्चित रूप से समुचित आहार की आवश्यकता होती है।

 

👪कटोरी चम्मच का उपयोग :-

यह निवेदन है कि जहाँ तक संभव हो, कटोरी चम्मच से ही दूध पिलाएं। इसमें यह जरूरी है कि छोटी चम्मच की बजाय बड़ी चम्मच से दूध पिलाएँ, छोटी चम्मच से पिलाने से जल्दी जल्दी कम दोहराना पड़ता है जिससे शिशु नाराज होकर जोर जोर से रोने लगता है,साथ पैर पटकने लगता है, तब चम्मच को मुंह से कटोरी तक और कटोरी से मुँह तक ले जाने का व्यक्त ही नही मिल पाता है। चम्मच की डंडी समतल होनी चाहिए जिससे दूध को कण जमा न हो सके और सफाई आसानी से हो सके। दूध पिलाने को व्यक्त से पाँच मिनिट पहले से पूरी तैयारी कर ले , जिससे शिशु अत्याधिक भूखा न हो पाए और इत्मीनान से दूध पी सके। चार माह के बाद सीट कटोरी से जिसकी किनारी बाहर की ओर रहती है, दूध दिया जा सकता है।  जिसकी किनारी बाहर की ओर रहती है, दूध दिया जा सकता है। इससे होठों को चोट लगने का भय नहीं रहता है। जिस गति से शिशु आसानी से दूध पीता है, उतनी ही गति से कटोरी को तिरछा करते रहे। शुरु में दूध कटोरी के बाजू से गिरता है लेकिन कुछ समय बाद सामंजस्य स्थापित हो जाता है। दूध पिलाने के तुरंत बाद डकार दिलाएँ, विरह आसानी से सो सकता है,खेल सकता है।

अतः जिस तरह की आदत डाली जाएगी, शिशु आसानी से सीख जाएगा।  आज इतने बड़े होकर भी हम डोसा कांटे , छुरी की बजाये हाथ से कहते है , वरना ३ वर्ष का बालक कांटे, छुरी से बिना गिराए आसानी से खा पाते,हाथ का ही सदुपयोग करते है।


👪बोतल का उपयोग एवं सावधानियाँ :-

 

दूध की बोतल का उपयोग तभी करें,जब दुग्धपान के सभी प्रयोग विफल हो जाएँ। यह आखिरी विकल्प होना चाहिए क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में इसकी साफ सफाई नामुमकिन तो नहीं, लेकिन कठिन जरूर है। हर बार दूध पिलाने से पहले बोतल 10 मिनिट और निपल 5 मिनिट तक पानी में उबालने पर ही कीटाणुरहित हो पाती है। जैसा अपने घरों में अक्सर होता है दूध पिलाया, कोई काम याद आया, बोतल वहीं छूट जाती है. गृहणी के काम में व्यस्त रहने के कारण घर में 3-4 घंटे निकल जाने का आभास नहीं होता. एक के बाद दूसरे काम निकल आते हैं और जब बच्चा भूख से रोता है, तब ध्यान आता है कि बोतल कहाँ रखी है? अब कल्पना करें, बोतल 10 मिनिट तक उबलती रहे और शिशु भूख से रोता बिलखता रहे, शायद यह नामुमकिन है। हम हर चीज सहन कर सकते हैं लेकिन बालक का भूख से रोना हमारी सहनशक्ति के बाहर है।

 

जब तक शिशु खेलता है, सभी खिलाते रहते हैं, जैसे ही वह भूख से रोता है, सभी चिल्लाने लगते हैं, माँ से ही अपेक्षा करते हैं कि वही दूध दे। वह भी बेचारी गुस्से में आटा सने हाथों से बचा दूध निकाला. ठंडा या गरम पानी जो भी हाथ आया, बोतल को धोया, दूध भरा और पिलाया जिससे जल्द ही घर में मचा कोहराम समाप्त हो। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम साफ सफाई के मापदण्ड नहीं समझते लेकिन जब शिशु रोता है, तब हमारी समझ में सिर्फ यही आता है कि कैसे जल्द से जल्द उसे चुप कराया जाए। अतः बोतल की साफ सफाई उन्ही घरों में संभव है जहाँ एक सदस्य यह जिम्मेदारी पूर्ण निष्ठा के साथ निभाए। सामान्य परिस्थितियों में जहाँ घर की पूरी कार्य प्रणाली माँ पर ही निर्भर रहती है, यहाँ पर यह रखरखाव कुछ कठिन हो जाता है। अनेक बार सुबह की चाय के कप दोपहर की चाय बनने पर ही धूल पाते हैं। मतलब यह नहीं कि घर के लोग काम नहीं करते, अन्य कार्यों में व्यस्त रहने के कारण न चाहते हुए भी ऐसी परिस्थिति निर्मित होती है।

इसके उपरांत भी दूध पिलाने के लिए यदि बोतल का उपयोग आखिरी विकल्प हो, तब इन बातों का अवश्य ध्यान रखें:-

  •  दिन में जितनी बार दूध देना है उससे एक बोतल अधिक रखें, एक बोतल एक ही बार उपयोग करें, बचे हुए दूध को निकालकर बोतल तुरंत पानी से धोकर अलग रखें।
  •  अलग बर्तन में बोतल १० मिनिट और निपल ५ मिनिट तक उबालने से कीटाणुरहित हो पाती है।
  • कांच की बोतल का उपयोग करें,इसमें गंदगी दिखाई देती है, साफ़ करने के लिए ब्रश का उपयोग करें। बोतल की चूड़ी का विशेष ध्यान दें क्योकि वहाँ अक्सर दूध के कण जमा रह जाते है। 
  •  निप्पल में से दूध के प्रवाह की गति इतनी होनी चाहिए कि एक बूंद के बाद दूसरी बूंद तो दिखे परंतु बूंदों की संख्या न गिन सके। यह जानकारी बोतल में दूध भरकर प्राप्त करें, पानी भरकर नहीं। यदि निपल का छेद छोटा रहता है, तो शिशु को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। बड़ा छेद होने पर दूध एकदम शिशु के मुख में भर जाता है, ठसका लग जाता है और ठीक से दूध नहीं पी पाता है।
  •  जिस प्रकार स्तनपान के समय गोद में लेते हैं उसी अवस्था में लेकर दूध पिलाएँ. माँ की गोद,सानिध्य और वात्सल्य की गर्माहट से वंचित न करे। माँ का स्निग्ध स्पर्श शिशु के लिए अति आवश्यक है।
  • दूध पिलाते समय बोतल में दूध की सतह चूड़ी के ऊपर होना चाहिए. इससे दूध के साथ हवा पेट में जाने का अंदेशा नहीं रहता है। पूरा दूध पी लेने के बाद हर बार भली प्रकार डकार दिलाना आवश्यक है।
  •  जब एक बोतल बाकी बचे तब सारे काम छोड़कर पहले बोतलें साफ करे, उबालें, फिर अन्य काम करे।
  •  बोतल में दूध ठंड में लगभग आधे घंटे और गरमी के मौसम में 15 मिनिट से ज्यादा देर तक न रखें, इतने समय में दूध खराब हो जाता है. खट्टी सी दुर्गध आने लगती है। सफर के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें। सफर के दौरान अनुमान से २ बोतलें अधिक रखें ताकि परेशानी न हो।
  •  बोतल पलंग पर न रखे, बोतल गिरकर चादर से, मच्छरदानी से टकराती है और हम उठाकर दूध पिला देते हैं। हम पलंग पर बैठकर फल खा रहे हैं, यदि एक टुकड़ा चादर पर गिर जाता है, उठाकर वापस फिर से प्लेट में नहीं रखते, लेकिन अंजाने में वही बोतल उठाकर दूध पिला देते हैं।
  •  निप्पल को हाथ न लगाएँ, अक्सर निप्पल के छिद्र पर अंगुली रखकर बोतल हिलाकर फिर दूध पिलाते हैं, निप्पल के छिद्र पर मलाई या पाउडर के कण फंसने पर निपल को दबाकर साफ करते हैं, इससे बीमारियों का डर रहता है।

 

इतनी सब सावधानियों के बाद भी करबद्ध निवेदन और अपेक्षा है कि कटोरी चम्मच से ही दूध पिलाएँ, बोतल से बचे। बोतल से शिशु को दूध पिलाना, दस्तों को निमंत्रण देना है। यह तथ्य वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध है कि कटोरी चम्मच की अपेक्षा बोतल से दूध पिलाए जाने से बच्चों को दस्त लगने की संभावना अधिक होती है।


👪बोतल क्यों और कब बंद करें:-


जिन बच्चों को परिस्थितिवश बोतल से दूध दिया जा रहा है उनको १ वर्ष की आयु होते तक बोतल बंद कर दें। इन बच्चों को प्रथम जन्म दिन पर गिलास से बढ़कर कोई दूसरा तोहफा नहीं है। इस उम्र तक वह अपने दोनों हाथों से गिलास पकड़कर स्वयं ही दूध पी सकता है और ऐसा करके वह गर्भ महसूस करता है। इस वक्त बोतल बंद नहीं करने पर वह ६ वर्ष की आयु तक बोतल से दूध पीता है। जिस बोतल का उपयोग माताएँ अपनी तथाकथित सहूलियत के लिए शुरु करती हैं, वह बाद में परेशानी की वजह बन जाती है। एक वर्ष के बाद भी बोतल से दूध देने से निम्न नुकसान संभव हैं :

  •  बच्चा बड़ा हो जाता है, चलने फिरने लगता है, उसको नियमानुसार साफ करके बोतल देने पर भी जितनी मर्जी होगी, उतना पिएगा, दूसरे कमरे में जाएगा, बगीचे में जाएगा, बोतल के साथ खेल करेगा, फेंकेगा, उठाएगा, निपल पर हाथ लगाएगा, फिर दूध पीने लगेगा। वह अबोध साफ सफाई के मापदण्डों से अनभिज्ञ है।
  •  शिशु बोतल से तीव्रगति से आसानी से दूध पी लेता है, चबाने में अलाली कर जाता है और चबाना नहीं सीख पाता है। हर चीज को गुटकना चाहता है, भोजन का निवाला, संतरे की कली,अंगूर देने पर वह चूसता है, जब तक खट्टा मीठा स्वाद आता है तब तक ठीक, जैसे ही भोजन स्वादरहित हो जाता है, मुँह से निकाल कर फेंक देता है । वह समझ ही नहीं पाता कि भोजन को चबाना क्या विधा है?
  •  एक वर्ष की आयु तक शिशु 24 घंटे में 1 से डेढ़ लीटर दूध तक पी लेता है जो कि इस उम्र तक सामान्य बाढ़ और विकास के लिए पर्याप्त है फिर 2 वर्ष के बच्चे के लिए 2 लीटर, 3 वर्ष के बच्चे के लिए ढाई लीटर दूध की आवश्यकता है। इतना हम ले भी दें तो 1 लीटर दूध से ज्यादा एक वयस्क नहीं पी सकता, तो शिशु इतनी मात्रा में दूध कैसे पिएगा, अर्थात् आयु अनुसार दूध की मात्रा बढ़ाई नहीं जा सकती है।

 

अक्सर बोतल छुड़ाने पर बच्चे दूध पीना कम कर देते हैं, कभी कभी बंद भी कर देते हैं और माता पिता घबरा जाते हैं कि शिशु भूखा रह जाएगा, लेकिन चिंतित न हों, दूध पीना कम करेगा तो खाना खाएगा। इस दुनिया में खाली पेट कौन रह सकता है? जब हमें भूख लगती है, बासी रोटी पकवान नजर आती है। भरे पेट पकवानों की कोई अहमियत नहीं है। 'भूख न देखे जूठा भात, प्यास न देखे धोबी घाट, नींद न देखे टूटी खाट'

नासा की कई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल मेडिकल साइंस में।

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जानिए नासा का कनेक्शन मेडिकल साइंस में कैसे ? डॉ. जेडी पोल्क (चीफ मेडिकल ऑफिसर, नासा ) द्वारा

जल्दी ही ऐसे यंत्र बनेंगे जो वातावरण में मौजूद भाप को ऑक्सीजन में बदलेंगे , अस्पतालों में उपलब्धता बढ़ेगी।

जिस तरह एक बीमारी को दूर करने के लिए एक डॉक्टर मानव शरीर को सूक्ष्म तरीके से समझने की कोशिश करता है, उसी प्रकार नासा अथाह अंतरिक्ष को गहराई से समझने की कोशिश करता है, ताकि हर नई खोज और ज्ञान को मानव कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा सके। नासा अधिकतर सरकारी एजेंसियों से बहुत अलग है। यह दुनियाभर की बाकी स्पेस एजेंसियों से भी अलग है। बहुत कम लोग जानते हैं कि नासा के पास देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है। हम सिर्फ खोज और आविष्कार करते हैं। नासा पर पैसा कमाने का भार भी नहीं है। नाला दुनिया को एक अविभाजित अस्तित्व के तौर पर देखता है। नासा जब धरती को अंतरिक्ष से देखता है तो उसे सीमाएं नजर नहीं आती।

नासा में डॉक्टर होने के नाते मेरा काम यह सुनिश्चित करना है कि अंतरिक्ष में यात्रा करने वाले एस्ट्रोनोट्स हर हाल में तंदरुस्त रहें। आज नासा की कई टेक्नोलॉजी मेडिकल साइंस में इस्तेमाल हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर मानव शरीर के तापमान को नापने के लिए आज जिस थर्मो गन का इस्तेमाल हो रहा है, वह थर्मो स्कैन टेक्नोलॉजी पर आधारित है। इस टेक्नोलॉजी की मदद से नासा ग्रहों के तापमान को नाप लेता है।

नासा ने और भी कई ऐसी तकनीक इजाद की हैं, जिनका मेडिकल साइंस में इस्तेमाल हो सकता है। हमारे पास एक ऐसा सैटेलाइट है, जो हवा और मिट्टी में नमी को नापने का काम करता है। इस टेक्नोलॉजी के उपयोग से यह पता किया जा सकता है कि कहां मच्छर पनप रहे हैं, जो डेंगू और जीका जैसी बीमारियां बढ़ा सकते हैं। इस जानकारी के आधार पर पब्लिक हेल्थ अर्थारिटी सचेत होकर रोकथाम की कार्यवाही कर सकती है।

कोविड-19 के मरीजों को वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ती है। नासा की जॉइंट प्रपल्शन लैब के इंजीनियरों ने मात्र 39 दिनों में न सिर्फ हल्का और कारगर वेटिलेटर बनाया, बल्कि बिना लाइसेंस फीस के कई देशों को इसे बनाने की छूट भी दे दी है। जो भी देश इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहते हैं वे कर सकते हैं। कोरोना महामारी के दौरान मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है।

आप जानते हैं कि अंतरिक्ष में ऑक्सीजन है ही नहीं। हम ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, जिसे ऑक्सीजन कॉन्सनट्रेटर्स कहते हैं। इसकी मदद यंत्र वातावरण में मौजूद भाप को इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेस से ऑक्सीजन में बदल देगा। यानी ऑक्सीजन की बोतलों को भरने या बदलने की मेडिकल साइंस में आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। इस तकनीक को हम स्पेस में तो इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जल्दी ही इसका इस्तेमाल आसानी से अस्पतालों में हो सकेगा। इस तकनीक का सबसे ज्यादा लाभ उन देशों को होगा जो आज ऑक्सीजन के सप्लाई चेन से बहुत दूर है। वे जंहा जरूरत हो ऑक्सीजन बना सकते है। आप सोच के देखिए वो परिस्थिति जब एक भी मरीज की मौत किसी भी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से नहीं होगी। ऐसा समय दूर नहीं है।

 

दिसंबर के अंत में या जनवरी की शुरुआत में हमें चीन में पनप रही बीमारी के बारे में पता लगना शुरू हुआ। हमें ऐसा लगा कि सासं या मर्स की तरह ही इस बीमारी को भी रोक लिया जाएगा। लेकिन एक स्पेस एजेंसी होने के नाते हमने जनवरी की शुरुआत में अपने सिस्टम्स की टेस्टिंग इस नजरिए से शुरू कर दी थी कि अगर जरूरत पड़ी तो क्या हम बिना ऑफिस आए काम जारी रख सकते हैं। हमारे लिए ये जानना जरूरी था कि अगर हम टेलिवर्क करते हैं तो हमारा आईटी सिस्टम कितना लोड ले सकता है।मानव शरीर के तापमान को नापने के लिए आज जिस थर्मो गन का इस्तेमाल हो रहा है,नासा उसी टेक्नोलॉजी की मदद से ग्रहों के तापमान को नापता है।

 

कोरोना वायरस  के बारे में जानकारी मिलने के तुरंत बाद ही नासा की टॉप लीडरशिप ने बहुत जल्दी ऐसे निर्णय लेने शुरू कर दिए थे ताकि कम से कम मानव संसाधन के इस्तेमाल से जरूरी काम नासा के सेंटर से किए जा सकें और बाकी सब लोग टेलिवर्क कर सकें। बिना यात्रा किए अगर काम को अंजाम देना हो तो लॉजिस्टिकल चुनौतियां क्या हो सकती हैं इसका मूल्यांकन भी हमने बहुत जल्दी शुरू कर दिया था। जिन लोगों को डीएम-2 स्पेस एक्स मिशन के लिए स्पेस यात्रा करनी थी, हमने तत्काल उनके लिए कोविड टेस्टिंग की व्यवस्था कर दी थी। हम स्पेस स्टेशन में किसी किस्म का संक्रमण बर्दाश्त नहीं कर सकते। खास तौर पर ऐसा संक्रमण, जिसकी न तो दवा हो और ना ही कोई वैक्सीन।

महामारियों का अनुमान लगाने और वैक्सीन दवा बनाने तक में भविष्य में सुपर कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से काफी मदद मिलेगी। इसरो जैसे संस्थानों के साथ साझा कार्यक्रम भी बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है। स्पेस हमें बताता है कि अनंत ब्रह्मांड में हम रेत के जरें के बराबर भी नहीं है। हम सिर्फ इतना ही मान सकते हैं कि यात्रा करना ही हम सब की नियति है।यात्रा की तुलना में मंजिल का अस्तित्व उतना महत्वपूर्ण नहीं है।


Monday, July 6, 2020

हमें बच्चों को कल की ऐसी नौकरियों के लिए तैयार करना है जो अभी किसी ने देखी भी नहीं हैं।

'कल की कक्षाएं '


हमें इन छह तरीकों से तैयार करनी होंगी 'कल की कक्षाएं '

कोरोना ने सभी लोगों की जिंदगी प्रभावित की है। अस्थायी रूप से स्कूलों के बंद होने से एजुकेशन के क्षेत्र में एक मोड़ आया है, जिसमें दुनियाभर में छात्रों के लिए ऑनलाइन लर्निंग ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प रह गया है। इसलिए अब तकनीक आधारित लर्निंग इकोसिस्टम बनाना और भी जरूरी हो गया है। ऑटोमोबाइल से लेकर और रिटेल तक, आज हर इंडस्ट्री में तकनीक आधारित इनोवेशन हो रहे हैं। हालांकि एजुकेशन इंडस्ट्री में बहुत बदलाव नहीं हुए और हमने अपने बच्चों को वैसे ही पढ़ाना जारी रखा जैसा एक सदी पहले पढ़ाते थे। लर्निंग इकोसिस्टम अब भी अंकों और ग्रेड्स पर ध्यान देता है।

अब तकनीक ने बच्चों के सीखने में अपनी जगह तो बना ली है, लेकिन इसे क्रांति का रूप लेने में अभी समय है। बिग डेटा एनालिटिक्स भी मदद करेंगे। तकनीक आधारित लर्निंग इकोसिस्टम बनाने और भविष्य के लिए तैयार रहने के लिए हमें इनकी जरूरत है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षणः हमारे मौजूदा शिक्षा तंत्र की समस्या 'रंटने वाली लर्निंग' है। वीडियोज और एनिमेशन से लर्निंग यह बदल सकती है। बच्चे मुख्यतः देखकर सीखते हैं। वीडियो के माध्यम से सिखाना ज्यादा आसान और उत्साहजनक होता है। इससे ध्यान कंसेप्ट को समझने पर ज्यादा होता है, जिसमें वास्तविक जीवन के उदाहरणों से समझाया जाता है।

बच्चों को एक्टिव लर्नर बनाना होगाः भारत दुनिया का सबसे बड़ा के-12 एजुकेशन सिस्टम है, फिर भी वैश्विक मूल्यांकनों में हम पिछड़े हैं। इसका मुख्य कारण है कि हमारा सिस्टम परीक्षाओं के डर से चलता है। बच्चों को अब भी सवाल हल करना सिखाया जा रहा है, पूछना नहीं। बच्चों को एंगेजिंग और गुणवत्तापूर्ण कंटेंट देने पर वे जीवनभर के लिए एक्टिव लर्नर बनगे। तकनीक पर आधारित लर्निंग से बच्चे खुद सीखने की पहल करते हैं और इससे वे अपनी गति से सीखने वाले लर्नर बनते हैं।

'एक तरीका सभी के लिए सही' की धारणा को तोड़नाः अच्छा एजुकेशन प्रोडक्ट छात्र की समस्याओं को पहचानेगा, साथ ही उसकी सीखने की गति के आधार पर खुद में बदलाव लाएगा। पर्सनलाइजेशन सुनिश्चित करता है कि छात्र खुद से सीखने की पहल करें। अध्ययन के प्रति ऐसा झुकाव बढ़ने से नतीजे भी बेहतर आते हैं।

शिक्षकों को डिजिटली सशक्त करनाः शिक्षकों की भूमिका जरूरी है और हमेशा रहेगी। शिक्षक आज शिक्षण कौशल को तकनीक आधारिक टूल्स से और बेहतर बना रहे हैं। इससे लर्निंग को एक नया आयाम मिलेगा। शिक्षकों द्वारा तकनीक के इस्तेमाल से वे कंसेप्ट्स को ज्यादा असरकारी,पर्सनलाइज्ड और एंगेजिंग तरीके से समझा सकते हैं।

लर्निंग को मजेदार बनानाः एजुकेशन में गेमीफिकेशन (पढ़ाई से जुड़े गेम्स) लर्निंग अनुभव को मजेदार, इंटरेक्टिव और ज्यादा असरदार बनाता है। इससे छात्र अपने लक्ष्यों को पाने के लिए प्रेरित होते हैं, जिससे अंततः लर्निंग के बेहतर नतीजे मिलते हैं। खासतौर पर छोटे छात्रों में देखा गया है कि गेम्स के इस्तेमाल से उनकी सीखने की इच्छा बढ़ती है।

शिक्षा तक सबकी पहुंच के लिए तकनीक का इस्तेमालः अब सर्वश्रेष्ठ पाठ्यक्रमों को कस्टमाइज कर देश के दूर-दराज के इलाकों के छात्रों तक पहुंचाया जा सकता है। अब भूगोल से परे जाकर इस क्षेत्र में भी काम करना कंपनियों का उद्देश्य होना चाहिए। हालांकि हमें डिजिटल असमानता अब भी एक चुनौती है। इसके लिए हमें प्रयास करना होगा कि स्मार्टफोन को ही प्रसार का मुख्य जरिया बनाएं, ताकि देश-दुनिया में कहीं भी छात्रों को उच्च क्वालिटी कंटेंट मिल सके। लर्निंग इकोसिस्टम को ऐसे बदलना होगा जो जीवनभर लर्निग के महत्व को बढ़ाए।

तकनीक से कंसेप्ट आधारित, पर्सनलाइज्ड लर्निंग को बढ़ावा देने की जरूरत है। ये सभी तरीके इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आने वाला समय ऑटोमेशन और तकनीक के और एडवांस होने का होगा। ऐसे में छात्रों के लिए कंसेप्ट आधारित लर्निंग और जरूरी हो जाती है, ताकि वे भविष्य में अपने कौशलों को बेहतर बनाने के लिए हमेशा तैयार रहें। हमें बच्चों को कल की उन नौकरियों के लिए तैयार करना है, जो अभी किसी ने देखी भी नहीं हैं। इसका एक ही तरीका है कि उन्हें तकनीक की मदद से शिक्षा दी जाए।

मौजूदा महामारी शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाई है और ऑनलाइन लर्निंग मुख्यधारा में आई है। दूसरी तरफ उम्मीद है कि अब शिक्षा का मिला-जुला मॉडल उभरेगा।बढ़ते स्मार्टफोन और इंटरनेट से प्रक्रिया तेज होगी। शिक्षक अब तकनीक के माध्यम से सिखाने का महत्व समझ रहे , इसलिए कक्षाओं में भी इसका असर दिखेगा। 'कल की कक्षाओं में टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण होगी। भविष्य में 'वनटू-वन' लर्निंग भी बढ़ेगी, जिससे छात्रों को उनके मुताबिक सर्वश्रेष्ठ मिल पाएगा। इसलिए अब हमें भारतीय शिक्षा तंत्र की मुख्य समस्याओं को हल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा आंत्रप्रेन्योर्स की जरूरत है, जो इसके लिए उत्पाद बनाएं।

Sunday, July 5, 2020

गुरुपूर्णिमा पर खास_सात्विक जीवनशैली अपनाने से भी बहुत कुछ ठीक हो जायेगा।

BK_Shivani_Brahmkumari
गुरुपूर्णिमा पर खास_बीके शिवानी जी,ब्रम्हकुमारी  द्वारा।

(सात्विकता अपनाने से हम सकारात्मकता भी पा सकते है। अपने विचारों में , कर्मों में सात्विकता लाये यह जीवनशैली में कुछ बदलाव लाकर किया जा सकता है। )

यहाँ सात्विक भोजन से मतलब नो जंक फ़ूड , नो स्पाइस फ़ूड बस साधारण भोजन अपनाना से है जिससे आपका शरीर फिट और निरोगी , सब बीमारियों से दूर रहेगा।

 

इस वैश्विक महामारी ने हमें जीवन जीने का नया तरीका सिखा दिया है। हमें वह सब सिखा दिया जो हम करना चाहते थे और जिसके लिए हम कहते थे कि हमारे पास समय नहीं है। जैसे जो कुकिंग नहीं करते थे, उन्हें समय मिला खाना बनाना सीखने के लिए। जब हमारे पास थोड़ा ज्यादा पैसे आ जाते है या जब काम से थक तब सोचते है  कि खाना बनाने की क्या जरूरत है, बाजार से खाना ले आते थे या खाना बनाने वाले को रख लेते थे। जबकि जब काम  आने के बाद ज्यादा थकावट होतो सिम्पल खिचड़ी भी बनाकर खायी जा सकती है और कहा भी जाता है जैसा अन्न, वैसा मन। अभी हमें समय मिला है कि हम इसका प्रयोग कर देखें। जब आप खाना बनाते हैं तो आप अपने रसोईघर में परमात्मा को याद करने वाले गीत चलाइए ताकि आपके घर में जो भी भोजन बन रहा है या फिर जो पानी रखा है, वह उच्च और सकारात्मक ऊर्जा वाले शब्दों को सोख सके। उस भोजन को जो-जो खाएगा, उसके लिए वैसे ही सकारात्मक ऊर्जा वाली बातें सोचना बहुत आसान हो जाएगी। इसलिए आप अपनी लाइफ स्टाइल में कुकिंग को शामिल कर सकते हैं, जिसका आपको अभी समय भी मिला है।

यह वायरस हममें से बहुत से लोगों को सात्विकता की तरफ ले जा रहा है। हममें से कई लोग इस समय तामसिकता से दूर हो गए हैं। जैसे अभी बाहर जाकर तामसिक खाना नहीं खा पा रहे हैं। सात्विक भोजन खाने से आधे से ज्यादा चीजें तो इसी समय ठीक हो जाएंगी। आज एक वायरस से हमें इतना डर लग रहा है कि हम हर समय उसी के बारे में सोच रहे हैं। लेकिन हम कर्म कौन-सा कर रहे थे? सिर्फ एक बात हमारे आगे के सब कर्मों को ठीक कर देगी। हमें उस बात का भी कभी-कभी शुक्रिया कर देना चाहिए। यह हमें बहुत कुछ सिखाकर गई है। और बहुत कुछ हमने जीवनभर के लिए सीख लिया है। दो महीने बाद,चार महीने बाद कोरोना वायरस सबको भूल जाएगा। जो कहते थे कि सोच रहा हूं कि सात्विकता को जीवन में अपना लूं, तो उनके लिए यह सबसे महत्वपूर्ण समय आ गया है।

हमने तो ब्रह्माकुमारी संस्था में इस सात्विकता को अपनाने के लिए प्रयोग किए है। जैसे हमने सात्विक भोजन ही करने का फैसला लिया। पहले दिन हमने सोचा था कि ये हमसे होगा कि नहीं होगा। लेकिन फिर मैंने सोचा कि प्रयोग करते हैं क्योंकि इसमें फायदा भी बहुत दिख रहा था। आजहममें से किसी को दस साल हो गए हैं और किसी-किसी को तो पचास साल तक हो गए हैं। हम सभी पूरे विश्व का चक्कर लगाकर आ गए। सभी तरह की परिस्थितियों में रह चुके हैं। बाहर हमें कभी-कभी एक-एक हफ्ता तक कुछ नहीं मिलता था खाने को। हम फल, सब्जी, दूध आदि खाकर रह लेते थे। लेकिन बाहर कोई तामसिक भोजन नहीं लेते थे।

हमने जो एक बार प्रतिज्ञा की फिर कभी भी वो नहीं टूटी। खाने समेत विचारों की, कमों की सात्विकता लाने की कोशिश शुरू करनी चाहिए। इस समय यह मौका मिला है कि हम शुरुआत करें।

 उदाहरण के लिए हमारा खाना बनाना और खाना दोनों घर में ही होने लगा है। इससे हमारे जीवन में बहुत परिवर्तन आएगा। इस समय यह हो सकता है कि जब हम खाना खाने बैठे तो पूरी फैमिली इकट्ठा बैठकर खाए और प्रतिज्ञा करे कि खाना खाते समय हमें ना तो मोबाइल देखना है और न ही टीवी ऑन करना हैं। ये अनिवार्य हो।

पहले परमात्मा को याद कीजिए, मन में सकारात्मक संकल्प कीजिए कि यह भोजन तन और मन के स्वास्थ के लिए अच्छा है। फिर भोजन करना शुरू कीजिए। क्योंकि वह भोजन हमारे मन की स्थिति पर असर करता है। अगर सभी लोग इकट्ठे मिलकर ऐसा करेंगे तो ये संस्कार पूरे परिवार के भी लोग सीख जाएंगे। और अगर सभी बोलकर करेंगे तो शायद सब लोगों को याद हो जाएगा, फिर थोड़े दिन के बाद तो मन में भी कर सकते हैं। क्योंकि अभी हमारी ये आदत बन रही है।

परमात्मा को याद कर मन में सकारात्मक

संकल्प लीजिए। जो लोग कहते थे कि सोच रहा हूं

सात्विकता को अपने जीवन में अपना लूं, तो उनके

लिए यह सबसे महत्वपूर्ण समय आ गया है।

रात को सोने के समय कोई भी नकारात्मक कंटेंट जैसे कि कोई मूवी, काम से संबंधित चीजें नहीं होनी चाहिए।क्योंकि रात को सोने से पहले जो कंटेंट अंदर जाता है, वह सारी रात काम करता है। अधिकतर लोग रात को इसी कारण से ठीक से सो नहीं पाते हैं। हमें ये समय अपनी जीवनशैली को सही करने के लिए ही मिला है। क्योकि आधे से दुःख तकलीफ तो जीवनशैली सही होने से ही सही हो जाते है।

अपनी जीवनशैली में बदलाव से जीवन को खुशहाल और फिट बना सकते है जो आपके भविष्य के लिए बहुत जरुरी है।

गुरुपूर्णिमा पर खास - खुशियों पर ध्यान दें , जीवन की खटास खुद ही कम हो जाएगी।

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गुरुपूर्णिमा पर जाने अंतरराष्ट्रीय जीवन गुरु गौर गोपाल दास जी से।

(देश के जाने -माने आध्यत्मिक और जीवन गुरुओं से जानिए कैसे नकारात्मकता और निराशा को ख़त्म कर पॉजिटिव जिंदगी जी सकते हैं... )

"अगर न्यू नार्मल का मतलब अनुशासन ही है , तो इसे ख़ुशी-ख़ुशी अपनाइये। थोड़ी तकलीफ होगी , लेकिन पछतावे के दर्द से हमेशा अनुशासन का दर्द बेहतर होता है। "

अनलॉक में हमें सबसे जरूरी यह बात ध्यान रखनी है कि जिएंगे तो जीतेंगे। अनलॉक में कुछ छूट मिली है तो कई लोग बेवजह भी बाहर जाने लगे हैं। लेकिन जोखिम अभी खत्म नहीं हुआ है। अभी भी अनुशासन की उतनी ही जरूरत है। हम यह ध्यान रखें कि जितना जरूरी है, जब जरूरी है, तभी बाहर निकलें और जिनको जरूरी वे ही बाहर निकलें। यह अनुशासन बना रहे।

हालांकि कुछ लोगों को मौजूदा रोक-टोक और अनुशासन से कुछ तकलीफ भी होने लगी है। लेकिन फिलहाल कोई विकल्प तो है नहीं, तो इसी अनुशासन के साथ खुशी-खुशी रहना चाहिए।

उदाहरण के लिए स्वस्थ रहने के लिए कोई व्यक्ति जीवन में अनुशासन लाता है, वह एक्सरसाइज करता है, मीठा नहीं खाता और डाइट फॉलो करता है। इस अनुशासन में उसे दर्द होता है,लेकिन यह उसे स्वस्थ रखता है। फिर अगर वह ऐसा नहीं करता

और उसका कॉलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है, कई बीमारियां होने लगती हैं तो दर्द तो इसमें भी होगा और साथ ही पछतावा भी होगा। तो यह हम पर निर्भर करता है कि हम कौन-सा दर्द चुनते हैं। अनुशासन का दर्द या पछतावे का। यह सच है कि लोग अनुशासन में रहकर थक चुके हैं, लेकिन अगर यही न्यू नॉर्मल है, तो इसे स्वीकार कर आगे बढ़ना ही होगा। कोरोना के इस दौर ने मन में बहुत नकारात्मकता भर दी है। कई लोग सोचते हैं कि इस समय हमने जो दर्द और परेशानियां देखी हैं, उनका मन पर लंबे समय तक असर रहेगा।

इसके जवाब में मैं एक किस्सा सुनाता हूं। गर्मी का मौसम था तो हम शिकंजी बना रहे थे। इसके लिए जब पानी में नींबू डाल रहे थे, तभी फोन आ गया। बातों-बातों में हमने आधे गिलास शिकंजी के लिए चार नींबू डाल दिए। उसका स्वाद चखा तो इतनी ज्यादा खटास थी कि किसी बेहोश आदमी को चखा दें तो उसे होश आ जाए। अब नींबू को पानी में से निकाल तो नहीं सकते। लेकिन पानी डाला जा सकता है न। उसमें चार-पांच गिलास पानी डाल देंगे तो उसकी खटास कम होगी और ज्यादा लोग शिकंजी पी पाएंगे।

जिंदगी भी ऐसी होती है। कोरोना ने हमारे जीवन में थोड़ी खटास ला दी है। हम इसे हटा तो नहीं सकते। लेकिन खटास कम तो की जा सकती है। इस समय हम अपनी खुशियों पर ध्यान दें, हमारे पास जो है, उसपर ध्यान दें। यह सोचें कि हमारा परिवार हमारे साथ है, हमारी नौकरी है,काम है , दोस्त हैं।

बच्चों पर भी इन स्थितियों का नकारात्मक असर पड़ रहा है जो कम हो जाएगी। स्कूल-कॉलेज फिलहाल शुरू नहीं होंगे। क्लासेस ऑनलाइन ही चल रही हैं, लेकिन ऑनलाइन में यह तो समझ आता नहीं है कि कौन कितना पढ़ रहा, कितना समझ रहा है। मेरी बहन एक शिक्षक हैं। हाल ही में उनका फोन आया था तो वे बता रही थीं कि कितना मुश्किल होता है ऑनलाइन पढ़ाना। जितनी तैयारी वे सामान्य दिनों में करती थीं, उससे ज्यादा तैयारी ऑनलाइन के लिए करनी पड़ रही है क्योंकि बच्चों को मोटीवेट भी रखना है। उन्हें चुटकुले और कहानियां निकालनी पड़ती हैं, बच्चों का मनोरंजन करते हुए उन्हें पढ़ाना पड़ता है। इसका मतलब है कि टीचर्स को अब ज्यादा मेहनत करनी है। और उनके साथ माता-पिता को भी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी।

अभी बच्चों की फिजिकल एनर्जी इस्तेमाल नहीं हो रही है अभी मन में डर है कि कहीं कोरोना न हो जाए। ऐसी नकारात्मक भावना से इम्यूनिटी कमजोर होगी। अभी मन स्थिर रखना जरूरी है। डरने और चौकन्ना रहने में अंतर हैं। हमें डरना नहीं है, चौकन्ना रहना है। क्योंकि वे घर पर हैं। और जब यह ऊर्जा इस्तेमाल नहीं होती तो वे बेचैन होने लगते हैं। हमें ऐसा लगता है कि ऐसी स्थिति में बच्चों की रुचियों पर ध्यान देना चाहिए। किसी को संगीत में तो किसी को खेल में रुचि होती है। कुछ दिन पहले मेरे पास एक माता-पिता का फोन आया। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे को फुटबॉल में रुचि है। लेकिन फुटबॉल खेलने नहीं जा पा रहा, तो क्या करें। हमने पूछा कि उसका पसंदीदा खिलाड़ी कौन है, उन्होंने कहा क्रिस्टियानो रोनाल्डो। तो हमने सलाह दी कि उसे दिन में एक घंटे रोनाल्डो के पुराने वीडियोज देखने को बोलिए। उसे उसके खेलने का तरीका सीखने को बोलिए।

रोनाल्डो के जितने इंटरव्यूज हैं, वे सुनने को बोलिए। वह देखे कि उसने जिंदगी में क्या-क्या किया, ताकि जब बच्चा बाहर निकले तो उन्हें अपने जीवन में अपना सके। ऐसे ही किसी को संगीत में रुचि है, तो इसकी भी कई ऑनलाइन क्लासेस उपलब्ध हैं। सिर्फ पढ़ाई की बात करते रहने से बच्चे मोटीवेट नहीं होंगे।

Monday, June 29, 2020

अब बॉलीवुड डिज्नी + हॉटस्टार में मूवीज लॉन्च करने जा रहा है जिसमे सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म "दिल बेचारा " भी होगी।

Disney+Hotstar
बॉलीवुड डिज्नी + हॉटस्टार- "लक्ष्मी बम","दिल बेचारा "&"भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया"  मूवीज लॉन्च 


 👉लक्ष्मी बम’, ‘भुज , सड़क- 2’, अन्य बॉलीवुड फिल्में  डिज्नी + हॉटस्टार की प्रमुख मूवीज में हैं।

👉डिज्नी + हॉटस्टार मल्टीप्लेक्स की पहली फिल्म तथा सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म "दिल बेचारा " होगी, जिसकी 24 जुलाई से स्ट्रीमिंग शुरू होगी।

👉इसके साथ ही अक्षय कुमार की "लक्ष्मी बम", आलिया भट्ट की "सड़क 2" और अजय देवगन की "भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया" शामिल हैं, बॉलीवुड की उन फिल्मों में से एक हैं, जो धारावाहिक डिज़नी / हॉटस्टार पर सीधी रिलीज़ के लिए लीड कर रही हैं, क्योंकि लॉकडाउन के कारण अभी थिएटर बंद हैं।

 

💗डिज्नी + हॉटस्टार मल्टीप्लेक्स की पहली फिल्म तथा सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म "दिल बेचारा " होगी, जिसकी 24 जुलाई से स्ट्रीमिंग शुरू होगी। दिवंगत अभिनेता की विरासत को सम्मानित करने के उद्देश्य से, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म फिल्म को नॉन सब्सक्राइबर्स के लिए भी उपलब्ध करा रहा है।

 

🔰डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सीधा रिलीज़ पाने वाले अन्य मूवीज में अभिषेक बच्चन-स्टारर "द बिग बुल", विद्युत जामवाल की "खुदा हाफ़िज़" और "लुटकेस" में कुणाल केमू और रसिका मुगल शामिल हैं।  

डिज़नी + हॉटस्टार मल्टीप्लेक्स द्वारा की गई पहल में  "फर्स्ट डे फर्स्ट शो की होम डिलीवरी"  का उद्देश्य कोरोनोवायरस के नेतृत्व वाले शटडाउन के मद्देनजर मध्य मार्च से रुकने वाले थिएटर अनुभव को फिर से फील कराना है। 

ये फिल्म जुलाई और अक्टूबर के बीच स्ट्रीमर पर रिलीज़ होगी। 

👉अक्षय ने कहा कि वह डिज्नी + हॉटस्टार वीआईपी पर "लक्ष्मी बम" की रिलीज का इंतजार कर रहे हैं।

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"लक्ष्मी बम" में अक्षय कुमार

फिल्म मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि यह पहली बार मेरे द्वारा किए गए कुछ अनोखे प्रयास हैं! यह हॉरर और हास्य का एक मनोरंजक मेलजोल है और इसमें एक मजबूत सामाजिक संदेश जुड़ा हुआ है! मुझे यकीन है कि यह फिल्म इन कोशिशों के समय में सभी के लिए खुशी और उम्मीद लाएगी, ”उन्होंने एक बयान में कहा।

 

👉अजय देवगन ने कहा कि इस पहल के माध्यम से लोग एक बार फिर से नई फिल्म रिलीज की उम्मीद करेंगे।

अजय देवगन "भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया"
अजय देवगन "भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया"

कोरोना महामारी ने हमारे सारे आराम की दुनिया को तहस-नहस कर दिया। और, एक ही समय में ओटीटी माध्यम जो काफी नई घटना थी, ने एक बड़ा महत्व प्राप्त किया, जहां तक ​​कि मनोरंजन का उपभोग करना है। भविष्य में, थिएटर और ओटीटी समानांतर में चलेंगे। 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' डिज्नी + हॉटस्टार वीआईपी पर - एक ऐसा मंच, जो हमारी फिल्म को देश की लंबाई और चौड़ाई में प्रदर्शित करेगा, "अभिनेता ने कहा।

 

👉आलिया, जो "सड़क २" में अभिनय करती हैं, जो उनके पिता, अनुभवी फिल्म निर्माता महेश भट्ट की 1991 की इसी नाम की फिल्म की अगली कड़ी है, ने कहा कि फिल्म उनके दिल के बहुत करीब है।

यह मेरे पिता के साथ काम करने का मेरा पहला मौका था, जो इस सपने को सच करता है। ये असाधारण और मुश्किल समय हैं और हम सभी इसके माध्यम से प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, प्रत्येक दिन एक समय में ले रहे हैं। मेरे पिता हमेशा कहते हैं कि एक फिल्म निर्माता की जगह दर्शकों की पसंद है, ”उसने कहा।

 

👉अभिषेक ने कहा कि फिल्मों और शानदार कहानी के माध्यम से किसी का मनोरंजन करने में सक्षम होने की खुशी से बड़ा कुछ नहीं है और यह वही है जो  'द बिग बुल करेगा; यह दर्शकों को अंत तक झुकाए रखेगा। मुझे खुशी है कि फिल्म डिज्नी + हॉटस्टार वीआईपी जैसे एक मंच पर लॉन्च होगी जहां देश भर के लोग रिलीज होने पर इसका आनंद ले सकेंगे।

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उदय शंकर, अध्यक्ष, वॉल्ट डिज़नी कंपनी APAC और अध्यक्ष, स्टार और डिज़नी इंडिया, ने कहा कि जैसे ही टीम ने डिज़्नी + हॉटस्टार मल्टीप्लेक्स को लॉन्च किया, वे अभी तक बॉलीवुड की सबसे बड़ी कंपनी को सीधे लाखों में लाकर एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की कगार पर हैं। देश भर में: थिएटर एक विशेष अनुभव है। इसलिए, वे हमेशा मौजूद रहेंगे और पनपेगें। लेकिन उद्योग की क्षमता जारी की गई खिड़कियों और सिनेमाघरों की संख्या से पूरी नहीं हो सकती है।

 

हमारी पहल थियटर रूप से फिल्मों की संख्या में वृद्धि कर सकती है, जिससे फिल्म-प्रेमियों को आनंद लेने के लिए और अधिक फिल्में बनाने के लिए रचनात्मक फिल्में मिलेंगी। हमारा दृढ़ विश्वास है कि यह भारत में बनने वाली अधिक और विभिन्न प्रकार की फिल्मों के लिए एक विशाल गति उत्पन्न करेगा। यह सभी के लिए एक जीत है, ”शंकर ने कहा।

 

महामारी ने बॉलीवुड के रिलीज कैलेंडर को एक विकल्प के रूप में स्ट्रीमिंग प्लेटफार्मों पर देखने वाले निर्माताओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। 


शूजीत सरकार ने इससे पहले अमिताभ बच्चन-आयुष्मान खुराना स्टारर "गुलाबो सीताबो" को अमेजन प्राइम पर रिलीज़ किया, जिसने विद्या बालन की शकुंतला देवी की बायोपिक और "पेंगुइन", "लॉ", "फ्रेंच बिरयानी" और "सूफियुम सुजायतुम" सहित साउथ की पांच अन्य फिल्मों का भी मंचन किया। "


गरीब,लावारिस व असहायों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । (Part-01)

गरीब,लावारिस व असहाय लोगों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । छू ले आसमां जमीन की तलाश ना कर , जी ले जिंदगी ख़ुशी की तलाश ना कर , ...