Translate

Friday, June 5, 2020

भारतीय उद्योग जगत में अर्थव्यवस्था के मायने -02 मिनट समय निकालकर जरूर पढ़ें।

भारतीय उद्योग जगत में अर्थव्यवस्था के मायने,अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति,अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी

कई आर्थिक विश्लेषण, आर्थिक विशेषज्ञ अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति बता रहे है , फिर भी हम परवाह क्यों नहीं करते। ये तीन हालात सुधर जाये तो अर्थव्यवस्था भी उबर जाएगी।

 

पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी ने भारत की सॉवरेन डेट रेटिंग कम कर दी। इसी एजेंसी ने 2017 में भारत की रेटिंग बढ़ाई थी। तब सरकार ने इस उपलब्धि को खासतौर पर बताया था।

इस बार रेटिंग कम होने पर खामोशी है। मूडी का आकंलन एक और सबूत है कि हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है और इसके लिए सिर्फ कोरोना दोषी नहीं है।

 

मूडी का बयान है: हालांकि कोरोना के संदर्भ में आज का कदम उठाया गया है, लेकिन इसके पीछे महामारी का असर नहीं है। बल्कि महामारी ने भारत के क्रेडिट प्रोफाइल की असुरक्षा को बढ़ा दिया है, जो कि इस झटके से पहले से ही मौजूद थी।

 

मूडी के नकारात्मक दृष्टिकोण के पीछे मुख्य कारण थे:

 

1) निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपर्याप्त सुधार।

2) घोषित नीतियों को ढंग से लागू न करना ।

3) वित्तीय क्षेत्र में तनाव ।

4) सरकारी खर्च पर नियंत्रण न कर पाना, जिससे घाटा और कर्ज बढ़ा।

 

कोरोना संकट खत्म होने के बाद भी भारत धीमी गति से चलेगा। यह सरपट दौड़ सकता था, अगर हमने कुछ चीजें सही की होतीं। देश में 2014 से मजबूत बहुमत की सरकार रही है। तब से वे लोग परेशान हैं जो पाकिस्तान की बेइज्जती करने से ज्यादा अर्थव्यवस्था की परवाह करते हैं। यहां तीन कारण दिए जा रहे हैं जिनकी वजह से हम कभी अपनी अर्थव्यवस्था नहीं सुधारते हैं:


➱ 1. भारतीय नागरिकों को अर्थव्यवस्था की परवाह नहीं है। पाकिस्तान को सबक सिखाइए और लाखों आपकी जय-जयकार करेंगे। अर्थव्यवस्था के बारे में बात कीजिए तो लोग जम्हाई लेंगे, चैनल बदल देंगे। नेता वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा जनता देखना पसंद करती है। यह केवल एक व्यक्ति या एक सरकार के बारे में नहीं है। जब लोग परवाह करना शुरू करेंगे तो नेता भी परवाह करेंगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था की परवाह क्यों नहीं करते? शायद भारतीय बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हैं। शायद हम किस्मत पर बहुत भरोसा करते हैं। हम सोचते हैं कि पैसा सिर्फ काम करने से नहीं आएगा। तभी आएगा, जब ईश्वर चाहेगा। इस आर्थिक उदासीनता के दुष्परिणाम आने वाले समय में दिखेंगे।

हमारी बड़ी बेरोजगार पीढ़ी है। आपको अब भी 7500 रु. महीने पर काम करने के लिए स्नातक मिल जाएंगे। यह 100 डॉलर/माह है। इतना पैसा अमेरिका में मैक्डॉनाल्ड में बर्गर पलटने वाले को एक दिन में मिलता है। हम कम वेतन वाले और कम इस्तेमाल हो रहे बाबुओं का देश बन रहे हैं, नौकरियां खत्म हो रही हैं, ऐसे में उम्मीद है कि सस्ते 4जी डेटा के साथ वीडियो देखने में व्यस्त हमारे युवा जागेंगे।


➱ 2. सरकार कोई भी हो, एंटी-बिजनेस ही होती है। मुझे पूरा यकीन है कि सरकार में बहुत से लोग इसे नकार देंगे। वे अपना पसंदीदा जुमला दोहराएंगे,ईज ऑफ डुइंग बिजनेस। सरकार के हिसाब से बिजनेस करने में आसानी का मतलब है कि एक आंत्रप्रेन्योर आईएएस अधिकारी के साथ बैठकर चाय की चुस्कियां लेता है, जहां अधिकारी आंत्रप्रेन्योर को बिजनेस करने देता है।

हालांकि ईज ऑफ डुइंग बिजनेस का मतलब मैं, जिसके पास सत्ता है, वह तुम्हें आसानी से बिजनेस करने दे रहा हैनहीं है। बल्कि यह मैं, अपनी सत्ता के बावजूद, तुम्हें बिजनेस करने से नहीं रोक सकताहै। सोच में यह बदलाव हमारे सत्ता चलाने वालों के लिए असंभव है।

हमारी अंतर्निहित जाति व्यवस्था वाली मानसिकता में बिजनेस नेताओं और बाबुओं से नीचे आता है। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्विटर के सीईओ से तकरार करते हैं। ट्विटर सीईओ जानते हैं कि कुछ भी हो जाए, राष्ट्रपति उनके बिजनेस को नुकसान नहीं पहुंचा सकते। क्या आप भारत में ऐसी कल्पना कर सकते हैं?

हम अर्थव्यवस्था की परवाह करें , बिज़नेस करना सही मायने में आसान हो और हमारे उधोगपति नए विचारों पर ध्यान दें तो हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है।

 

➱ 3. भारतीय उद्योगपतियों में नवाचार की कमी है। थोड़ा दोष बिजनेस मालिकों का भी है। उनमें से ज्यादातर नवाचार (इनोवेशन) और जोखिम को नकारते हैं और हुनर की कद्र नहीं करते। उनकी अपने बच्चों को शीर्ष नौकरी पर पहुंचाने, अन्य अमीरों के साथ पार्टी करने और कुछ के लिए शादियों में कोरोना के राहत पैकेज से भी ज्यादा खर्च करने में रुचि होती है।

बेशक अपने बच्चों को बिना काम के अमीर बनाओ। लेकिन क्या उन्हें हमेशा सीईओ की कुर्सी पर बैठना चाहिए? आप कंपनी चलाने किसी हुनरमंद को क्यों नहीं लाते? क्या आप जानते हैं कि इनोवेटिव कंपनियां एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट या अमेजॉन की व्यक्तिगत बाजार पूंजी भारत की सूचीबद्ध कंपनियों की कुल बाजार पूंजी के लगभग बराबर है?

 

क्या आपने किसी सच्चे इनोवेटिव अमेरिकी आंत्रप्रेन्योर को देखा है? वे कैसे रहते और सोचते हैं? क्या सिर्फ यही मायने रखता है कि आपके जन्मदिन पर कौन आया और आपकी अगली महंगी कार कौन-सी है? विरासत में मिला भौतिकवाद नहीं, सार्थक जीवन जिएं।

भारतीय अर्थव्यवस्था कई दशकों में ऐसी बुरी स्थिति में नहीं रही है। हम इसे नहीं सुधारेंगे तो अगली पीढ़ी बुरी तरह प्रभावित होगी। हम सभी , लोगों, सरकार और बिजनेस मालिकों को हमारी मानसिकता में बड़े बदलाव लाने होंगे, तभी भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी।


Wednesday, June 3, 2020

गरीब,लावारिस व असहायों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । (Part-01)

गरीब,लावारिस व असहाय लोगों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर ।
गरीब,लावारिस व असहाय लोगों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर ।


छू ले आसमां जमीन की तलाश ना कर , जी ले जिंदगी ख़ुशी की तलाश ना कर ,

तकदीर बदल जाएगी खुद ही मेरे दोस्त , मुस्कुराना सिख ले वजह की तलाश ना कर।

 

बस ऐसी ही सख्सियत का नाम है आशीष ठाकुर जिन्होंने अपना सब कुछ मानव जीवन को समर्पित कर दिया।  जहां कोई निराश्रित, अनाथ,असहाय मिलता है, बच्चे हो या बुजुर्ग सबका सहारा बनकर सामने खड़े हो जाते है।

सबसे बड़ी बात इनके अंदर वो जज्बे की है जिसमे कोई विक्षिप्त, बेसहारा,असहाय  कूड़े- कचरे में पड़ी लाशो को देखना भी पसंद नहीं करता उनका सहारा है-आशीष ठाकुर।

जब मंच में बात बोलने की होती है तो लोग बात तो बड़ी-बड़ी करते है पर जब इन विक्षिप्त, अपंग, कुंठित, परिवार से परित्यागे बुजुर्ग, बच्चे, भिक्षु सामने भी खड़ा कर दो तो हौसला पस्त हो जाता है हिम्मत जबाब दे देती है।

मोक्ष संस्थापक श्रीआशीष ठाकुर का बस एक ही उद्देश्य है निराश्रितों को आश्रय, भूखे निर्धनों को खाना-कपडा, मेडिकल सुविधा इलाज और  ज्ञात -अज्ञात शवों को जीवन के आखरी क्षण में धर्मानुसार अंतिम संस्कार। क्योकि आपका मानना है इस संसार में सबको प्यार और सहसम्मान जीने का अधिकार है और उसे उसका हक़ दिलाने के लिए सःह्रदय समर्पण भाव से आप हर पल खड़े है।

 

मुख्यअंश :

 

  •  जानें गरीब,बेसहारा,निराश्रित, अनाथो की सहायता पहुंचने और लावारिश ज्ञात-अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कार्य से गौरान्वित होती अपनी संस्कारधानी जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश में सफल प्रयास।
  •  जानें साधारण जीवन से लावारिश ज्ञात-अज्ञात शवों का सद्गति से अंतिम संस्कार करने का सफर।
  •  जानें कैसे मोक्ष संस्था की शरुआत व् स्थापना हुयी या इसकी स्थापना की जरुरत क्यों पड़ी।
  •  कोरोना संकट घडी में मानव सेवा- कोरोना संक्रमित शवों व् सस्पेक्ट्स का धर्मानुसार अंतिम संस्कार।
  •  जानें कैसे बिना किसी सरकारी या प्राइवेट फण्ड ना होने के बाबजूद संस्था बेसहारों, लावरिशो, निराश्रितों और ज्ञात- अज्ञात पार्थिव शरीरों को उनके मंजिल तक पहुंचना तथा सह सम्मान व् प्यार के साथ सेवा भावना।

 

➤ जानें गरीब, बेसहारा, निराश्रित, अनाथो की सहायता पहुंचने और लावारिश ज्ञात-अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कार्य से गौरान्वित होती अपनी संस्कारधानी जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश में सफल प्रयास। 

Moksh_Manav_sewa_avm_jan_Utthan_samiti
गरीबबेसहारानिराश्रितअनाथो की सहायता पहुंचने और लावारिश ज्ञात-अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कार्य से गौरान्वित होती संस्कारधानी। 

आज हम ऐसे व्यक्ति के जीवन से जुड़ी सच्ची कहानी लेकर आये है जिसे सुनकर शायद आपका दिल पसीज जाये और यदि नहीं पसीजता तो शायद मानवता आपके अंदर नहीं बस्ती पर हर आदमी के अंदर एक सॉफ्ट कार्नर होता है जिसने एक नन्हा सा दिल धड़कता रहता है शायद वह आज जोरो से धड़क उठे क्योकि बात ही कुछ ऐसी है जो लोगो का दिल जीत लें।

 

आज कितने ही लावारिश लाशे सड़क रोड में देखने आमूमन हमे देखने मिल जाती है जिसे हम शायद देखना भी पसंद नहीं करते क्योकि हम इंसानो की प्रवृत्ति ही कुछ ऐसी ही है जिसे अच्छा देखना ही पसंद है, परन्तु अच्छा व्यक्त बुरा व्यक्त देखकर नहीं आता , व्यक्त ही ऐसा समय का पहिया है जो इंसानो को सब कुछ अनुभव करा देता है रिश्तो की परिभाषाये बदल जाती है कौन बाप, कौन बेटा कौन किसका क्या लगता है। सब दुनिया में व्यर्थ है जब आपको मोक्ष की प्राप्ति होती है आदमी सोचता है की मेरा लड़का दमाद मुखाग्नि दे ,पिंड दान करेरिश्तेदारों द्वारा अर्थी को कन्धा दे, अंतिम संस्कार पुरे रीती रिवाजो से हो जाये जिससे आत्मा को शांति प्राप्त हो , जिसके लिए आप दिन रात काम करते रहते है भविष्य उज्जवल बनाते है अपना ही नहीं वरन अपने बच्चों का भी क्योकि आप जो करते है उन्ही के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा देते है और जब बच्चे बड़े होते है संस्कारी निकल गए तो किस्मत की बात है नहीं तो अनाथालय ऐसे ही नहीं भरा साहब। 

"पूरी जिंदगी जीत सकते है संस्कार से,

 और जीता हुआ भी हार जाता है अहंकार से " 

ना जानें कितने ही लोगो को अभी तक धर्मानुसार अंतिम संस्कार मोक्ष द्वारा किया जा चुका है

एक आंकड़ा - एम.एल.सी के आंकड़े के अनुसार एक वर्ष में लगभग एवरेज 1800 और पिछले 20 वर्षो से लगातार प्रयासों से 36,000 + पार्थिव शरीरों का रीती रिवाजो से अंतिम संस्कार किया जा चूका है, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है, इतना ही नहीं वर्ष  में एक बार हिन्दू रीती रिवाजो वालो को इलाहाबाद में पिंड दान भी करते है।

जबलपुर के आलावा सतना, रीवा इत्त्यादि और भी जिले में आपके वॉलेंटिर्स है जिनके माध्यम से सेवाएं जारी है।

जब मृत्यु होती है तब आपके परिवार वाले तो छोड़ो सरकारी प्रशासन भी हाथ खड़ा कर देता हैजब हमारे अपने आशीष भैया ऐसे लोगो का सहारा बनते है जिसका कोई नहीं  अभी तक न जाने कितने लावारिश मृत्य शरीरो को कन्धा दे चुके है न जाने कितने लोगो का पुरे रीती रिवाजो से अंतिम संस्कार कर चुके है बिना किसी सरकारी मदद के अपने ही खर्चो में ,अपनी प्राइवेट जॉब की पूरी कमाई इसी में लगा देते है कुछ अभी भी लोगो में मानवता बची है जो उनका इस काम में निःस्वार्थ भाव से सहयोग भी कर देते है जिससे लगातार पिछले 20 वर्षो से आप व् आपकी ये संस्था मानव उत्थान व् जन कल्याण का कार्य कर रही है। 

कहते है न खुशी में तो सब शामिल हो जाते है पर जो किसी के दुःख में शामिल हुआ वही सच्चा इंसान है।


  जानें साधारण जीवनकाल से लावारिश ज्ञात-अज्ञात शवों का सद्गति से अंतिम संस्कार करने का सफर।

 

आपके पिता पुलिस में सिपाही थे । आप दो भाई और दो बहन है।  , जब आप 12th में थे तब आपके पिता जी का रिटायरमेंट हो गया। तब पिता जी ने कहा अब घर (गांव) चलना है क्योकि  पिता जी ने बहुत साधारण नौकरी की थी उनकी अंतिम सैलरी 5400 रू. थी और उन्होंने 45 रू. से नौकरी शुरू की थी। परिवार के जिम्मेदारी अब आपके ऊपर थी तब आपने पार्ट टाइम नौकरी करना उचित समझा , सबसे पहले आपने आईडिया कंपनी में काम किया बात तक़रीबन वर्ष 2000-2001 की थी तभी आपने नेताजी सुभाष चंद्र बॉस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में सिक्योरिटी सुपरवाइजर की नौकरी भी ज्वाइन की तब आपकी सैलरी 1500 रू. थी

एक बार की बात है वर्ष तक़रीबन 2000-2001 जब आप अपनी साइकिल से मेडिकल नौकरी पर जा रहे थे तो आपने देखा की एक लावारिश शव मेडिकल के सामने डाला हुआ और बहुत भीड़ लगी हुयी है फिर जब शाम को नौकरी से वापस आ रहे तब वही देखा तो भीड़ तो नहीं थी पर कुछ कुत्ते शवों को खींच रहे थे उसके चीथड़े निकल कर खा रहे थे , उनकी मृत बॉडी में हड्डियों के अलावा कुछ नहीं बचा था, क्योकि 2 दिनों से शव वही पड़ा हुआ था।

फिर मैं साइकिल उठाकर गया गया मेडिकल चूँकि मैं वही नौकरी करता था तो कुछ लोग मेरे को पहचानते थे कोई छोटू बोलता था कोई कुछ , फिर में पोस्टमॉर्डन विभाग में गया वह ये सब बताया की वह एक लावारिश लाश पड़ी है , फिर उन्होंने कहा क्या करना है मैंने कहा कुछ कर दो कुत्ते खा रहे है फिर वही कुछ लोग जो खाली थे उस व्यक्त, मेरे साथ चले चूँकि ये रोजाना का काम था उनका इसलिए उन्हें संकोच भी नहीं लगा , तब वह शव को लेकर आये और जहा लावारिश शवों को पोस्टमार्डम के बाद डाला जाता था , तब इलेक्ट्रिक सिस्टम नहीं था शवों को जलाने का तो एक चैम्बर में डाल दिया जाता था जिससे शव सड़ जाते थे वहां बहुत बदबू आती थी ,इसके मैंने वही एक गढ्ढा करवाया और वहीं उस लावारिश को दफ़न किया, अगरबत्ती लगाया अंतिम संस्कार किया  चूँकि उस समय मैं अपने मैं छोटा था और सामान्य परिवार से था मेरा दिल रो दिया उस शव को देखकर अब आप इसको जो भी कह लें पर ये मेरे द्वारा पहली लावारिश लाश थी जिसे कन्धा दिया गया , सहारा दिया गया अंतिम संस्कार किया गया वर्ष 2000-2001

आप वर्ष 2002-2003 में हितकारिणी कॉलेज जबलपुर में प्रेसिडेंट बने तब आप लोगो का ग्रुप हुआ करता था जो भी बेसहारा आदमी मिलता उसे खाना कपडा जो भी मेरे पास होता मैं उन्हें दे दिया करता था। और हम लोग उस पंग्ति में आख़री आदमी की सहायता करना चाहते थे जिसका कोई नहीं । एक जूनून सा सवार था जो लाश लावारिश मिले जिसका कोई नहीं प्रशासन भी हाथ खड़ा करें उसे कन्धा दिया जिसको चलते क़र्ज़ भी बहुत हो गया था मेरे ऊपर चिता को जलने में लकड़ी लगती है जिसे लेकर लाखो का क़र्ज़ हो गया था पर तब भी किसी ने मुझे उधारी देने से मदत नहीं किया शायद लोगो की दरयादिली ही है।

मेरे दीदी को शादी में सुजुकी बाइक दिए थे जो मेरे पास रह गयी थी जिससे में कॉलेज जाया करता था उसे मेरे जीजा जी ने लेने से माना कर दिया , मैंने उसे भी गिरवी रख दिया क़र्ज़ उतारने के लिए। ऐसे ही चलते चलते जिंदगी का सफर चलता रहा ऊपर वाले ने भी मेरी बहुत मदत की मैंने बहुत सी कंपनियों में भी नौकरी किया जैसे मक्डोनल्ड्स ,साँची, HDFC  ,Kodak, L&T आदि कंपनियों में काम किया, वर्तमान में D.L.L. एस्कॉर्ट्स  में कलैक्शन मैनेजर हूँ पर कोरोना मंदी के दौर में नौकरी चली गयी । शैक्षणिक योग्यिता – 12th  बायो, बी.एस.सी बायो।


  जानें कैसे मोक्ष संस्था की शरुआत व् स्थापना हुयी या इसकी स्थापना की जरुरत क्यों पड़ी की।


वर्ष 2007 में मोक्ष को रजिस्टर्ड किया गया जहाँ इसका पूरा नाम "मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति जबलपुर" रजिस्टर्ड है और रजिस्टर्ड नंबर  04/14/01/00826/07 है , जैसे कही कोई हत्या हो गयी बॉडी 3-4 दिन से वही पड़ी है ये 2007 की बात है भेड़ाघाट में रहता है दूध वाला उसने बताया भैया वह बहुत बदबू आ रही है वह कोई जा नहीं पता ये भेड़ाघाट रोड में सड़क के किनारे की घटना थी वह जाकर देखा तो बॉडी पड़ी थी उसमे कीड़े लगे थे बॉडी सड़ रही थी , और ऐसा बहुत बार होता है बॉडी बहुत ही दुर्दशा में पड़ी मिलती है जिसे लोग देख भी न पाए।

जब को डेड बॉडी मिलती है तो सबसे पहले पुलिस को इन्फॉर्म किया जाता है जब नीचे के अधिकारी नहीं सुनते तब ऊपर भी बात करनी पड़ती है चूँकि पहले कभी इस मामले में फसे नहीं थे और अपनी सेवाभाव से समाज का एक वर्ग दुर्भावना भी रखता है जिसको लेकर कुछ मामले भी मेरे ऊपर बने तब कुछ पत्रकार बंधुओ ने कहा की आशीष अब इसे रजिस्टर्ड करा लो। तब जाकर मैंने मोक्ष संस्था की स्थापना की।

अभी स्थिति ज्यादा अच्छी तो नहीं पर इतनी अच्छी तो है की हज़ार लाखों न सही पर जो भी सहायता के लिए आता है या जो सामने दिख जाता है उसकी पूरी सहायता मोक्ष द्वारा की जाती है।

 

 कोरोना संकट घडी में मानव सेवा- कोरोना संक्रमित शवों व् सस्पेक्ट्स का धर्मानुसार अंतिम संस्कार।

 

Moksh_Manav_Sewa_avm_Jan_Utthan_Samiti
कोरोना संकट में भी धर्मानुसार शवों का अंतिम संस्कार करते हुए - मोक्ष (श्री आशीष ठाकुर )


अभी जब कोरोना आया तो नगर निगम प्रशासन के लोगो ने बॉडी उठाने से मना दिया और फिर हमसे कहा गया तब हमने कहा ठीक है हम बॉडी उठायेंगे और नगर निगम की ब्रेकडाउन वाली गाड़िया हमे दे दी गयी। उन गाड़ियों में हमारे लड़के ही गाड़ी चलाते है , हमारे लड़के ही शवों को उठाते है और उनके धर्मानुसार शवों का अंतिम संस्कार करते हैं।


अभी प्रशासन के द्वारा हमारी
1 टीम को हायर किया गया है उसमे 30 लोग है तथा प्रशासन ने आश्वासन दिया है की 1 महीने के लिए पूरी मदत की जाएगी। अभी तक लगभग 40 शवों का अंतिम संस्कार धर्मानुसार किया गया जिसे कोरोना पॉजिटिव व् कोरोना सस्पेक्ट दोनों ही शामिल है और लावारिश शवों की बात करें तो लगभग 30-35 शवों का भी अंतिम संस्कार किया गया।

कोरोना में लोगो के सेवा के लिए भोजन वितरण भी चालू किया है जिसमे प्रतिदिन  लगभग 8000 भोजन के पैकेट्स जरूरतमंद परिवारों को वितरित किये जाते जा रहे है।

सबसे दिलचस्प बात यहाँ पर यह  की लोग खुद हेल्प करवाते है जैसे आज प्रतिदिन 8000 लोगों को भोजन कराया जा रहा है जहाँ लोग खुद स्वेक्षा से मदत करते है खाना बनाते है खाना बाटते है जिससे यह कार्य चल रहा है हमारा बस एक ही लक्ष्य है इस दुनिया में कोई भी बेसहारा , असहाय और भूखा न रहे और प्रेम से जो भी कुछ देता है रख लेते है।

लॉकडाउन के दौरान भी मानवता का यह कार्य जारी रहा चाहे जरूरतमंद परिवार को राहत सामग्री हो या पका भोजन देना , बस्तियों में पानी के संकट को दूर करना (पानी के टैंकर पहुंचाकर), नंगे पैर पैदल चलते प्रभासी मजदूरों के दर्द को समझा उन्हें पैरो में पहनने चप्पल-जूते दिए,तन को ढकने कपडे दिए , उनके खाने का प्रबंध कराया इतना ही नहीं बहुत से फंसे प्रभासी मजदूरों को उनके गंतव्य स्थल तक पहुंचाने का प्रबंध भी किया गया (बसों द्वारा )। 

Moksh_Manav_Sewa_avm_Jan_Utthan_Samiti
कोरोना संकट काल में मोक्ष द्वारा मानव सेवा एवं जन उत्थान में भोजन वितरण ताकि कोई भूखा न रह सकें

 

 जानें कैसे बिना किसी सरकारी या प्राइवेट फण्ड ना होने के बाबजूद संस्था बेसहारों, लावरिशो, निराश्रितों और ज्ञात- अज्ञात पार्थिव शरीरों को उनके मंजिल तक पहुंचना तथा सह सम्मान व् प्यार के साथ सेवा भावना।


मोक्ष को आज तक कोई अनुदान सरकारी नहीं मिला कोई नेता ने कोई एक पैसा इन गरीबो की सेवा के लिए नहीं दिया वल्कि फोटो खींचने सब चले आते है हज़ारो - लाखों  की भीड़ में मुझे एक नारियल और श्रीफल देकर सम्मानित कर देते है पर जब उनसे कहो की 1-2 ऐसे बेसहारा परिवारों की जिम्मेदारी ले तब कोई सामने नहीं आता।

सारे लोग न सही पर मुट्ठी भर लोग दुनिया में है जिससे जीवन चल रहा है कही किसी बस्ती में पानी की जरुरत है तो कोई पानी  का टैंकर दे गया , कोई ने डीज़ल दे दिया जिससे यह  कार्य  चल रहा है।

इस संसार में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग निवास करते है जिसकी जैसे सद्भावना है वो वैसा दान दे देता है जिससे  यहाँ पर खड़े है हमारी संस्था का अकाउंट रजिस्टर्ड नंबर है। 

"किसी से बदला लेने की खुशी दो दिन तक रहती है परन्तु किसी की सेवा करने की खुशी जिंदगी भर रहती है।"

दान का मतलब यह नहीं है की सिर्फ पैसा आप अपने पुराने कपडे, खिलोने, घर का बचा खाना,अनुउपयोगी वस्तुयें अथवा जो आवश्यकता से अधिक हो इत्त्यादि, आपका ये छोटे से छोटा सहयोग  भी अभावग्रस्त और जरुरतमंदो के चेहरे की मुस्कान बन सकता है।  हमसे संपर्क करने के लिए नीचे दिए कॉन्टैक्ट नंबर, फेसबुक पेज या वेबसाइट पर भी जा सकते है।

Website: https://mokshaindia.org/

Facebook page: https://www.facebook.com/mokshaindia786/

Contact No. : 9300122242

#शासन-प्रशासन से भी निवेदन है इस मतलबी दुनिया में बहुत ही कम ऐसे लोग है जो मानव उत्थान में निःस्वार्थ भाव से कार्यशील है इसलिए इनके इस मानव सेवा के कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें जिससे यह मानव सेवा एवं जन उत्थान संस्था और व्यापक रूप से कार्य करने में सक्षम हो सकें धन्यबाद !!

Moksh_Manav_Sewa_avm_Jan_Utthan_Samiti
Moksh_Manav_Sewa_avm_Jan_Utthan_Samiti

 आगे पढ़ें (पार्ट-02) 

➦ मोक्ष संस्था अध्यक्ष श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी अनसुनी कहानी।


मोक्ष संस्था अध्यक्ष श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी अनसुनी कहानी। (Part-02)

पार्ट-01 देखने के लिए आगे दिए लिंक पर क्लिक करें-

गरीब,लावारिस व असहायों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । (Part-01)


मोक्ष संस्था अध्यक्ष श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी अनसुनी कहानी।
मोक्ष संस्था अध्यक्ष श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी अनसुनी कहानी।

 देश दुनिया में बहुत से समाज सुधारक आये और गए जैसे राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद व् अन्य जिन्होंने  बाल विवाह , सती प्रथा को ख़त्म किया , विधवा पुनर्विवाह चालू करवाया , समाज की कुरीतियों को मिटाने का प्रयत्न किया।

आज हम ऐसे ही समाज सुधारक और मानव सेवा एवं जन उत्थान का वीडा उठाये हुए मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी कुछ अनसुनी कहानी सुनने जा रहे है।

आप लोगो से आशा है 2 मिनिट निकालकर जरूर इसको पढ़ेंगे ;

 

➢ आप ज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कैसे करते है जबकि उनके परिजन भी ज्ञात  रहते है?

 

ऐसे बहुत से लोग मिलते है जो अपने परिजनों का अंतिम संस्कार नहीं करना चाहते उनका कहना होता है मेरे माँ ने मेरे लिए कुछ नहीं किया , मेरे बाप ने मेरे लिए कुछ नहीं किया , मेरे भाई ने मेरे लिए कुछ नहीं किया , मेरी बहन ने मेरे लिए कुछ नहीं किया जिससे रिश्ते तार तार हो जाते है और लोग रिश्तेदार होते हुए भी लावारिस और वो उनके शवों को छोड़कर चले जाते है।

 

वैसे ये काम तो पुलिस ,मेडिकल विभाग का ही है पर वो ये काम हमे देने लगे , एक अंतिम संस्कार के लिए पुलिस को 600 रू. मिलते थे जो वो मेडिकल कर्मियों को देना होता था पर जब घटना स्थल पर  पुलिस आरक्षक की ड्यूटी लगती थी तो वो यह कह देता, भैया मैं कहा से दू ! बस परोपकार और दिल की आवाज़ सुनकर और संघर्ष करते करते आज यहाँ तक आ गए।

 

➢ आप लावारिस पार्थिव शरीर के अंतिम यात्रा को सफल बनाने और जन उत्थान कल्याण में कैसे लिप्त होते चले गए और लोग इस कार्य में आपसे कैसे जुड़ते चले गए ?

आज से 7-8 वर्ष पहले मैंने शिक्षा मंदिर शुरू किया जिसमे बाजनामठ मंदिर के सामने जो अगरबत्ती , प्रसाद के दुकानदार उनके बच्चे और  जो भी असहाय है उन्हें पढ़ाना शुरू किया। आज सब बच्चे बड़े हो गए है और अपना अपना बिज़नेस करने लगे है जो आज मुझसे इस कार्य मैं भी जुड़े है।

 

लावारिश शवों के लिए गाइडलाइन तो बहुत है पर उन्हें फॉलो कोई नहीं करना चाहता इसलिए इस सामाजिक समस्या का बीड़ा हमने उठा लिया। इतने शव हम यहाँ जबलपुर में प्रशासन की निगरानी में दफना चुके है की जगह कम पड़ गयी। अंतिम संस्कार के लिए जमीन अलॉटमेंट को लेकर हमने जिला प्रशासन को कई बार अर्जी दी, तो प्रशासन द्वारा एक जमीन तो अलॉट हुई पर वो भी राजनीती की बलि चढ़ गयी। अधिकांश सामाजिक लोग चाहते तो है कि लोगो का अंतिम संस्कार धर्मानुसार हो पर जब बात उनके गली मुहल्ले की आती है तो वे विरोध प्रदर्शन करने लगते है क्योकि वो शमशानघाट अपने घरो के आस पास नहीं चाहते, जिससे आज तक लावारिश शवों को जगह नहीं मिली।

 

बहुत से लावारिश लोग है जिनकी माँ बाप मर गयी बच्चे अनाथ हो गए वो दिन को मजदूरी करते और शाम को मेरे साथ रहते जो भी आवश्यकतायें होती में पूरा करता , क्योकि उनके लिए ये मैटर नहीं करता की उनके पास खुद की छत है या नहीं आवश्यकतायें ही बहुत है। मेरी टीम मैं आज 30-40 महिलाये है जो शिक्षक है और भी अच्छे पद में है जो बिना किसी प्रलोभन बस अपितु निःस्वार्थ भाव से सच्चे दिल से कार्य में लगी है। इसी तरह 30 -40 लड़के भी है जो किसी न किसी जॉब में है जैसे कोई एम्बुलेंस चालता है कोई टैक्सी इसी तरह के बहुत सारे लड़के आज मेरे साथ जुड़े हुए है जो निःस्वार्थ भाव इस कार्य में सहयोग देते है क्योकि पहले जब एक दिन में एक साथ 6-7 बॉडी आ जाती थी अंतिम संस्कार के लिये तो सच मानो आप तबियत ही जवाब दे देती थी  की कैसे करेंगे पर ऊपर वाले  ने साथ दिया क्योकि कहते है ना  "जिसका कोई नहीं खुदा तो है यारों " तो बस चलते चलते यहाँ तक आ गये।

उसके बाद जब मैं जॉब में आया तो बहुत सारे ऐसे भी लड़के है जिसे मैंने जॉब में लगाया जिसे कई कंप्यूटर इंजीनियर, ग्रजुएट भी है जो कुछ ऑनलाइन या अल्टरनेट मदद देते रहते है।

 

➢ आपने अभी तक कितने लोगो का अंतिम संस्कार कर चुके है ?


आंकड़ा तो सही बता नहीं पाऊंगा परन्तु एम.एल.सी के आंकड़े के अनुसार वर्ष में 1600-2000 ज्ञात, अज्ञात, लावारिश , असहाय पार्थिव शरीर/ शवों का अंतिम संस्कार सह-सम्मान के साथ कर देते है क्योकि "प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अंतिम यात्रा में सहसम्मान इस दुनिया से विदा होने का अधिकार है। "

कुछ ऐसे भी परिवार होते है जो आर्थिक रूप से कमजोर है और अपने परिवार के सदस्य के लिए लकड़ी भी इक्कठा नहीं कर पाते उनके लिए लकड़ी, क्रियाकर्म,अंत्येष्टि आदि के लिए व्यवस्था भी कर देते है।

और इस हिसाब से अगर एवरेज 1800 प्रत्येक वर्ष पकडे तो 2000 से 2020 तक करीब-करीब 36,000 + पार्थिव शरीर/शव होते है जो खुद में एक बहुत बड़ा आंकड़ा है। बस मैं ये सब नि:स्वार्थ भाव से करता चला गया और पता भी नहीं चला कब कितने शवों को कंधे दे दिए क्योकि सबके जीवन में ये लाइन तो कॉमन है " बुरा व्यक्त कभी बताकर नहीं आता , मगर सिखाकर और समझाकर बहुत कुछ जाता है !!" इसलिए सेवाभाव से बड़ा कोई धर्म नहीं है इस दुनिया में।

 

 हाल ही का कोई किस्सा बताये जिससे हम व् हमारे समाज के लोग समझ सके रिश्ते की परिभाषा।

 

गोरखपुर के बहु प्रतिष्ठित साडी भण्डार की दुकान जिस ज़मीन में बनी है वो जमीन मालिक शहर में भीख मांगता था और एक दिन की बात है वह आदमी भीख़ मांगते-मांगते मर गया जैसे ही  हमलोगो को पता चला की रेलवे ट्रैक के पास लावारिश लाश पड़ी है जब हम वहां पहुंचे और उस मृतक के परिजनों का पता लगाया तो पता चला उनके बेटी-दमाद तो यही रहते है और गोरखपुर के बहु-प्रतिष्ठित साडी भण्डार का संचालन करते है फिर हमने उन्हें भी वही घटना स्थल में बुलाया  मृतक पिता के शरीर को देखकर कुछ देर तो बेटी ने रोया पर जब हमने उन्हें शव ले जाने बोला तो उन्होंने कहा मेरे पिता ने मेरे लिए कुछ नहीं किया मैं उनका अंतिम संस्कार नहीं करुँगी आपलोगो को जो सही लगे आप स्वयं करें।

तब हमने कहा अंतिम-संस्कार न सही पर अंतिम व्यक्त में खड़े तो हो जाइये तब दूसरे दिन मेडिकल पोस्टमार्डम विभाग में उनलोगो के साथ उनके रिश्तेदार भी लम्बी-लम्बी गाड़ियों से आये पर सबने कह दिया आपको जैसा करना करें हम कुछ नहीं कर सकते

कहने का मतलब बस इतना सा है की यदि वो लोग, मृतक के अंतिम समय में लकड़ी या मृत शरीर को अग्नि भी दे देते तो उस बेचारे बृद्ध मृतक की आत्मा को शांति मिल जातीं।

 

इसलिए साधु संत भी  कहते है 'जीवन नश्वर है आप क्या लेके आये थे और क्या लेके जाओगे , इस जीवन को मानव सेवा में लगा क्योकि इससे बड़ी सेवा और कोई नहीं' 'ये रिश्ते मोह माया हैसमय में कोई काम नहीं आता।'

 

➢ कुछ लोग लाश का सौदा करने से भी परहेज  करते और सक्षम व्यक्ति भी अवसर का लाभ उठाना चाहता है ।

अभी  कुछ दिन पहले पता चला कुछ लोग तिलवारा पास लाश लेकर बैठे अंतिम संस्कार के लिए पैसे इकठ्ठे कर रहे है तब हमने लाश को जलाने के लिये लकड़ी का प्रबंध करा दिया फिर रात में पता चला वो लोग अभी भी बैठें तब मैंने वहां जाकर उनको बहुत हड़काया और मृतक का अंतिम संस्कार कराया।

मैंने अपने परिवार की संवेदनाओ को छोड़कर लोगो के संवेदनाओं जीवन लगा दिया है रोज सुबह होती है रोज शाम होती है और हर दिन कुछ नया कार्य में लग जाते हैं।

 

कुछ सक्षम आदमी ऐसे भी होते है जो अवसर का फायदा उठाना नहीं छोड़ते जैसे मृतक के लकड़ी के पैसे के लिए इंतज़ाम हमने किये ,अंतिम संस्कार हमने कराया और जब उनके वापस जाने के लिए वाहन इंतज़ाम में थोड़ी देर हुयी तो खुद ही गाड़ी बुक करके वापस चले जाते है।

🔁धर्मानुसार आप हिन्दुओ में खारी विसर्जन कराते हैं और साल में एक बार इलाहाबाद जाकर सबका पिण्डदान भी करते हैं।

"कहने और लिखने के लिए तो बहुत कुछ है आपके बारें में जिसे शायद में अपने इस छोटे से ब्लॉग में कवर न कर सकूँ पर आपकी मानव सेवा के प्रति महानता को Fight इंडिया प्रणाम करता है।"   

मोक्ष संस्था अध्यक्ष श्री आशीष ठाकुर जी की जुवानी अनसुनी कहानी।
Moksh_Manav_Sewa_avm_Jan_Utthan_Samiti

जरूर पढ़ें(पार्ट-01) ➥ 

गरीब,लावारिस,अनाथ,असहाय लोगों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर ।


Thursday, May 28, 2020

The truth of Prime Minister's unemployed allowance scheme 2020

Pradhanmantri_Berojgari_Bhatta_Yojna_2020_Fake_news
Know the truth about Pradhanmantri_Berojgari_Bhatta_Yojna_2020_Fake_news

Highlights;

  • What is the truth of PM Berojgari Bhatta Scheme?
  • Prime Minister unemployed allowance scheme only a rumor, online application form, do not register. PM Berojgar Bhatta 2020 Scheme is Fake.

We all know how much unemployment is there in our country. Even today, if a single place is vacant for peon to higher posts, then people who have done PhD on it also do not hesitate to apply. In such a situation, many such rumors from job to unemployment allowance are spread on which people easily believe. One such scam has hit our hands, so thought that you should be careful about it. Nowadays, a lot of rumors are flying through social media about Prime Minister Unemployment Allowance or a scheme named Pradhan Mantri Berojgari Bhatta (PM Unemployment Allowance). Through this message being spread on social media, people are being misled that unemployment allowance will be received from the central government, but the truth of this message or message is something else.

 

If you too are hearing about such a scheme and are about to apply, then read this article before us so that your eyes are slightly opened. In this article we will also tell you how you can find out if the plan is right or not. Stay with us till the end to know the truth of the Prime Minister's Unemployment Allowance Scheme.


  •  Prime Minister Unemployment Allowance | What is the truth of PM Berojgari Bhatta Scheme?

Truth Behind Pradhan Mantri Unemployment Allowance Scheme Explained Here;

A message will be sent to you through Prime Minister's Unemployment Allowance 2020 through your WhatsApp or any other social media. In which it is being claimed that the Prime Minister will give 3500 rupees a month to the unemployed people and you have to apply for this, in this message this application is also being told absolutely free. Also, it would have been given that only 20 crore youth will get the benefit of this scheme, then you should get your registration done as soon as possible. The registration date is often extended and the message is being forwarded to the people. But the truth is that no such scheme has been implemented.

PM_Berojgari_Bhatta_2020_Facts

  • Information Asked:

Now when the plan is not implemented, then what is the truth of the link being provided with the message, or the link given on any other blogger's site (https://pradhanmantri-berozgar-bhattayojna.blogspot.com/  & http://bit.ly/pradhanmantri-berozgaari-bhattaa-yojna) is this also false. 

All these links are fake, after visiting this link you will be asked some important information, including your name, your father's name, Indian citizen or not, your age and as soon as you fill all this information another page will open in front of you. , On which you will have been given till Mubarakabad for registration. Also, on that page you must have given that you can take your unemployment allowance by going to Gram Panchayat. But as soon as you fill this information, then see what can really happen to you.


  • Loss of information:

Now as soon as you have given all your information, it can cause two losses, firstly, all the money lying in your bank accounts can be wiped away because you were lured by Rs 3500. Apart from this, all your information will be sold to a private private company, from which you will keep receiving various types of messages and emails. 


  • Truth of the link being spread:

Now, let's talk about the truth behind this link (http://bit.ly/pradhanmantri-berozgaari-bhattaa-yojna). It is a completely fake link and there is another link hidden inside it which is your private information. Wants to get you selected. The hidden link behind this link is from this site www.earnwithkp.com.

 

  • Now you know how to find out on which site your information is safe and which is not :

Keep in mind that this is not the only link through which a fake scheme called Prime Minister Unemployment Allowance is being promoted. You will see many more links; it is prudent that you do not trust any such links. 

Prime Minister unemployed allowance scheme only a rumor, online application form, do not register. PM Berojgar Bhatta 2020 Scheme is Fake.


  • How to know if the site is fake or not :

Whenever you visit a site, especially to complete the process like registration, first check whether the site is secure or not, for this you will be given a Secure or Not Secure at the address bar of your browser. Apart from this, you can see the http: // before the URL, if this is given before the site, then the information is not safe, if it is given https: // before the link to the site, then the site is secure. The S given on this is the pinnacle of security but here mostly https: // is hidden when you copy link site & paste on your any platform like whatsup,google etc. you can direct found the truth behind the site.

 

Also, keep in mind one thing, most of the scheme's official website ends with extensions like .gov, .nic, .org. Therefore, after checking URL completely, take any action. You put a link in the website and search in Google; if the website is really official then you will see the information related to it on other blogs and news portals.

  • We take care of you:

Through our site, we do not only inform you about the scheme, but you also take care that you do not get misled through any other site.

 

कोरोना वायरस इम्पैक्ट : डर के माहौल में बच्चों को कैसे संभाले?

#FIGHT_INDIA#FIGHT_CORONA अधिकांश शहरों के कार्यालय बंद है या फिर वर्क फ्रॉम होम (Work from home) कल्चर में है,सब जगह Lockdown के स्ति...