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Tuesday, July 7, 2020

शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा जानें बाहरी दूध शिशु को कब , कैसे और क्यों पिलाये या पिलाना क्यों जरुरी है या नहीं।

Dr.P.K.Mehta
 

➕डॉ. प्रदीप कुमार मेहता (M.B.B.S., M.D.) शिशु स्वास्थ्य विज्ञान

द्वारा जाने शिशु और बाहरी दूध से सम्बंधित जरुरी बातें। 

👶मुख्य बिंदु:-

👉कटोरी चम्मच का उपयोग 

👉बोतल का उपयोग एवं सावधानियाँ 

👉बोतल क्यों और कब बंद करें

जब कभी अतिरिक्त दूध की वास्तविक आवश्यकता प्रतीत हो तो पहले माँ का दूध दें, फिर बाहरी दूध दें। शिशु की एक वर्ष की आयु तक पाउडर का दूध, गाय भैस के दूध से बेहतर विकल्प है।इसमें यह बहुत जरूरी है कि दूध बनाने में डिब्बे पर लिखे दिशा निर्देशों का पालन करे। दूध पाउडर के डिब्बे के साथ मिली चम्मच को सतह से भरकर एक चम्मच पाउडर 30 मि.ली. उबालकर ठंडे पानी में मिलाना चाहिए। इस  अनुपात का कड़ाई से पालन करना जरूरी है क्योकि इस अनुपात में पाउडर मिलाने से दूध गाढ़ा बनता ,देखकर डर सा लगता है कि छोटा शिशु इतना गाढ़ा दूध शायद न पचा सकेगा और हम अपने ध्यान में दूध की छवि के अनुरूप पतला कर देते है। माँ का दूध नैसर्गिक रूप से काफी पतला दिखता है. इससे पाउडर के गाढ़े दूध को पचाने का भय द्विगुणित हो जाता है और हम अनजाने में पानी की मात्रा बना देते है, जो उचित नहीं है। अत: निर्देशित अनुपात में दूध बनाएँ, जितना शिशु पिए, उतना पिलाएँ, बचाकर न रखें। दूध पाउडर का इस्तेमाल, पैकेट खोलने के 3 सप्ताह अथवा नियत तिथि जो भी पहले हो, के अंदर अवश्य करें।

 

प्रकृति में हर प्रजाति की दूध की संरचना उसके नवजात की आवश्यकताओं को अनुरूप निर्मित है। हम प्रकृति के संसाधनों के प्रतिरूप बनाने में अति सक्षम है परन्तु आज तक माँ के दूध की नक़ल में सफलता प्राप्त नहीं कर सके। पाउडर का दूध एक महंगा विकल्प है। यधपि गाय, भैस शिशु की प्राकृतिक माँ नहीं है लेकिन अपरिहार्य परिस्थितियों में गाय या भैंस का दूध जो शुद्ध उपलब्ध हो, यही देना चाहिए। गाय और भैस के दूध में मुख्य अंतर दूध में वसा की मात्रा है जो भैंस के दूध में गाय के दूध से अधिक होती है। सामान्यतः सभी घरों में उबालकर ठंडा  करके दूध दिया जाता है। उबालने से दूध जीटाणुरहित हो जाता है और दूध की मलाई निकल जाने से दोनों दूध की वसा की मात्रा लगभग समान हो जाती है। इस दूध में पानी न मिलाएँ। आधे पाव दूध में एक चम्मच शक्कर (100 मिली दूध में 5 ग्राम शक्कर) अवश्य मिलाएँ, इससे अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है और वसा का पाचन आसान हो जाता है। शक्कर से सर्दी होती है, कीड़े हो जाते हैं, यह भ्रान्ति है। दूध को बार बार गरम न करें, ऐसा करने से हम अपना काम बढ़ाते हैं, शाम तक दूध बहुत गाढ़ा हो जाता है जिससे दूध के पाचन में कठिनाई होती है।

जो शिशु पूर्ण रूप से बाहरी दूध पर निर्भर रहता है, यह प्रारंभिक दिनों में प्रतिदिन लगभग 500-600 मि.ली. दूध पीता है। एक माह की आयु तक यह मात्रा लगभग एक लीटर तक पहुंच जाती हैतब सामान्यतः डर लगता है कि शिशु इतना दूध पचा पाएगा या नहीं, कुछ नुकसान तो नहीं होगा। यह सोचकर अनजाने में दूध की मात्रा कम कर देते हैं। जब हम वयस्क एक लीटर दूध नहीं पी सकते तो शिशु को पिलाने में डरते हैं। यह भावना निर्मूल है क्योकि जब शिशु माँ का दूध पीता है. उसे कितनी मात्रा मिलती है. इसका अंदाज हमको नहीं हो पाता है। अतः जब तक शिशु पीता रहे, बेझिक पिलाएँ,डरे नहीं, जब उसका पेट भर जाएगा तब वह स्वाभाविक रूप से नकार देगा। पर्याप्त दूध की मात्रा मिलने पर शिशु प्रसन्नचित रहता है।

शिशु का वजन 5 माह की आयु में जन्म के समय का दुगना, एक वर्ष में तिगुना और दो वर्ष में चार गुना हो जाता है। पूरे जीवनकाल में इस गति से हमारा वजन कमी नहीं बनता है। अत: जब इतनी तेजी से वजन सकता है तो निश्चित रूप से समुचित आहार की आवश्यकता होती है।

 

👪कटोरी चम्मच का उपयोग :-

यह निवेदन है कि जहाँ तक संभव हो, कटोरी चम्मच से ही दूध पिलाएं। इसमें यह जरूरी है कि छोटी चम्मच की बजाय बड़ी चम्मच से दूध पिलाएँ, छोटी चम्मच से पिलाने से जल्दी जल्दी कम दोहराना पड़ता है जिससे शिशु नाराज होकर जोर जोर से रोने लगता है,साथ पैर पटकने लगता है, तब चम्मच को मुंह से कटोरी तक और कटोरी से मुँह तक ले जाने का व्यक्त ही नही मिल पाता है। चम्मच की डंडी समतल होनी चाहिए जिससे दूध को कण जमा न हो सके और सफाई आसानी से हो सके। दूध पिलाने को व्यक्त से पाँच मिनिट पहले से पूरी तैयारी कर ले , जिससे शिशु अत्याधिक भूखा न हो पाए और इत्मीनान से दूध पी सके। चार माह के बाद सीट कटोरी से जिसकी किनारी बाहर की ओर रहती है, दूध दिया जा सकता है।  जिसकी किनारी बाहर की ओर रहती है, दूध दिया जा सकता है। इससे होठों को चोट लगने का भय नहीं रहता है। जिस गति से शिशु आसानी से दूध पीता है, उतनी ही गति से कटोरी को तिरछा करते रहे। शुरु में दूध कटोरी के बाजू से गिरता है लेकिन कुछ समय बाद सामंजस्य स्थापित हो जाता है। दूध पिलाने के तुरंत बाद डकार दिलाएँ, विरह आसानी से सो सकता है,खेल सकता है।

अतः जिस तरह की आदत डाली जाएगी, शिशु आसानी से सीख जाएगा।  आज इतने बड़े होकर भी हम डोसा कांटे , छुरी की बजाये हाथ से कहते है , वरना ३ वर्ष का बालक कांटे, छुरी से बिना गिराए आसानी से खा पाते,हाथ का ही सदुपयोग करते है।


👪बोतल का उपयोग एवं सावधानियाँ :-

 

दूध की बोतल का उपयोग तभी करें,जब दुग्धपान के सभी प्रयोग विफल हो जाएँ। यह आखिरी विकल्प होना चाहिए क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में इसकी साफ सफाई नामुमकिन तो नहीं, लेकिन कठिन जरूर है। हर बार दूध पिलाने से पहले बोतल 10 मिनिट और निपल 5 मिनिट तक पानी में उबालने पर ही कीटाणुरहित हो पाती है। जैसा अपने घरों में अक्सर होता है दूध पिलाया, कोई काम याद आया, बोतल वहीं छूट जाती है. गृहणी के काम में व्यस्त रहने के कारण घर में 3-4 घंटे निकल जाने का आभास नहीं होता. एक के बाद दूसरे काम निकल आते हैं और जब बच्चा भूख से रोता है, तब ध्यान आता है कि बोतल कहाँ रखी है? अब कल्पना करें, बोतल 10 मिनिट तक उबलती रहे और शिशु भूख से रोता बिलखता रहे, शायद यह नामुमकिन है। हम हर चीज सहन कर सकते हैं लेकिन बालक का भूख से रोना हमारी सहनशक्ति के बाहर है।

 

जब तक शिशु खेलता है, सभी खिलाते रहते हैं, जैसे ही वह भूख से रोता है, सभी चिल्लाने लगते हैं, माँ से ही अपेक्षा करते हैं कि वही दूध दे। वह भी बेचारी गुस्से में आटा सने हाथों से बचा दूध निकाला. ठंडा या गरम पानी जो भी हाथ आया, बोतल को धोया, दूध भरा और पिलाया जिससे जल्द ही घर में मचा कोहराम समाप्त हो। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम साफ सफाई के मापदण्ड नहीं समझते लेकिन जब शिशु रोता है, तब हमारी समझ में सिर्फ यही आता है कि कैसे जल्द से जल्द उसे चुप कराया जाए। अतः बोतल की साफ सफाई उन्ही घरों में संभव है जहाँ एक सदस्य यह जिम्मेदारी पूर्ण निष्ठा के साथ निभाए। सामान्य परिस्थितियों में जहाँ घर की पूरी कार्य प्रणाली माँ पर ही निर्भर रहती है, यहाँ पर यह रखरखाव कुछ कठिन हो जाता है। अनेक बार सुबह की चाय के कप दोपहर की चाय बनने पर ही धूल पाते हैं। मतलब यह नहीं कि घर के लोग काम नहीं करते, अन्य कार्यों में व्यस्त रहने के कारण न चाहते हुए भी ऐसी परिस्थिति निर्मित होती है।

इसके उपरांत भी दूध पिलाने के लिए यदि बोतल का उपयोग आखिरी विकल्प हो, तब इन बातों का अवश्य ध्यान रखें:-

  •  दिन में जितनी बार दूध देना है उससे एक बोतल अधिक रखें, एक बोतल एक ही बार उपयोग करें, बचे हुए दूध को निकालकर बोतल तुरंत पानी से धोकर अलग रखें।
  •  अलग बर्तन में बोतल १० मिनिट और निपल ५ मिनिट तक उबालने से कीटाणुरहित हो पाती है।
  • कांच की बोतल का उपयोग करें,इसमें गंदगी दिखाई देती है, साफ़ करने के लिए ब्रश का उपयोग करें। बोतल की चूड़ी का विशेष ध्यान दें क्योकि वहाँ अक्सर दूध के कण जमा रह जाते है। 
  •  निप्पल में से दूध के प्रवाह की गति इतनी होनी चाहिए कि एक बूंद के बाद दूसरी बूंद तो दिखे परंतु बूंदों की संख्या न गिन सके। यह जानकारी बोतल में दूध भरकर प्राप्त करें, पानी भरकर नहीं। यदि निपल का छेद छोटा रहता है, तो शिशु को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। बड़ा छेद होने पर दूध एकदम शिशु के मुख में भर जाता है, ठसका लग जाता है और ठीक से दूध नहीं पी पाता है।
  •  जिस प्रकार स्तनपान के समय गोद में लेते हैं उसी अवस्था में लेकर दूध पिलाएँ. माँ की गोद,सानिध्य और वात्सल्य की गर्माहट से वंचित न करे। माँ का स्निग्ध स्पर्श शिशु के लिए अति आवश्यक है।
  • दूध पिलाते समय बोतल में दूध की सतह चूड़ी के ऊपर होना चाहिए. इससे दूध के साथ हवा पेट में जाने का अंदेशा नहीं रहता है। पूरा दूध पी लेने के बाद हर बार भली प्रकार डकार दिलाना आवश्यक है।
  •  जब एक बोतल बाकी बचे तब सारे काम छोड़कर पहले बोतलें साफ करे, उबालें, फिर अन्य काम करे।
  •  बोतल में दूध ठंड में लगभग आधे घंटे और गरमी के मौसम में 15 मिनिट से ज्यादा देर तक न रखें, इतने समय में दूध खराब हो जाता है. खट्टी सी दुर्गध आने लगती है। सफर के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें। सफर के दौरान अनुमान से २ बोतलें अधिक रखें ताकि परेशानी न हो।
  •  बोतल पलंग पर न रखे, बोतल गिरकर चादर से, मच्छरदानी से टकराती है और हम उठाकर दूध पिला देते हैं। हम पलंग पर बैठकर फल खा रहे हैं, यदि एक टुकड़ा चादर पर गिर जाता है, उठाकर वापस फिर से प्लेट में नहीं रखते, लेकिन अंजाने में वही बोतल उठाकर दूध पिला देते हैं।
  •  निप्पल को हाथ न लगाएँ, अक्सर निप्पल के छिद्र पर अंगुली रखकर बोतल हिलाकर फिर दूध पिलाते हैं, निप्पल के छिद्र पर मलाई या पाउडर के कण फंसने पर निपल को दबाकर साफ करते हैं, इससे बीमारियों का डर रहता है।

 

इतनी सब सावधानियों के बाद भी करबद्ध निवेदन और अपेक्षा है कि कटोरी चम्मच से ही दूध पिलाएँ, बोतल से बचे। बोतल से शिशु को दूध पिलाना, दस्तों को निमंत्रण देना है। यह तथ्य वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध है कि कटोरी चम्मच की अपेक्षा बोतल से दूध पिलाए जाने से बच्चों को दस्त लगने की संभावना अधिक होती है।


👪बोतल क्यों और कब बंद करें:-


जिन बच्चों को परिस्थितिवश बोतल से दूध दिया जा रहा है उनको १ वर्ष की आयु होते तक बोतल बंद कर दें। इन बच्चों को प्रथम जन्म दिन पर गिलास से बढ़कर कोई दूसरा तोहफा नहीं है। इस उम्र तक वह अपने दोनों हाथों से गिलास पकड़कर स्वयं ही दूध पी सकता है और ऐसा करके वह गर्भ महसूस करता है। इस वक्त बोतल बंद नहीं करने पर वह ६ वर्ष की आयु तक बोतल से दूध पीता है। जिस बोतल का उपयोग माताएँ अपनी तथाकथित सहूलियत के लिए शुरु करती हैं, वह बाद में परेशानी की वजह बन जाती है। एक वर्ष के बाद भी बोतल से दूध देने से निम्न नुकसान संभव हैं :

  •  बच्चा बड़ा हो जाता है, चलने फिरने लगता है, उसको नियमानुसार साफ करके बोतल देने पर भी जितनी मर्जी होगी, उतना पिएगा, दूसरे कमरे में जाएगा, बगीचे में जाएगा, बोतल के साथ खेल करेगा, फेंकेगा, उठाएगा, निपल पर हाथ लगाएगा, फिर दूध पीने लगेगा। वह अबोध साफ सफाई के मापदण्डों से अनभिज्ञ है।
  •  शिशु बोतल से तीव्रगति से आसानी से दूध पी लेता है, चबाने में अलाली कर जाता है और चबाना नहीं सीख पाता है। हर चीज को गुटकना चाहता है, भोजन का निवाला, संतरे की कली,अंगूर देने पर वह चूसता है, जब तक खट्टा मीठा स्वाद आता है तब तक ठीक, जैसे ही भोजन स्वादरहित हो जाता है, मुँह से निकाल कर फेंक देता है । वह समझ ही नहीं पाता कि भोजन को चबाना क्या विधा है?
  •  एक वर्ष की आयु तक शिशु 24 घंटे में 1 से डेढ़ लीटर दूध तक पी लेता है जो कि इस उम्र तक सामान्य बाढ़ और विकास के लिए पर्याप्त है फिर 2 वर्ष के बच्चे के लिए 2 लीटर, 3 वर्ष के बच्चे के लिए ढाई लीटर दूध की आवश्यकता है। इतना हम ले भी दें तो 1 लीटर दूध से ज्यादा एक वयस्क नहीं पी सकता, तो शिशु इतनी मात्रा में दूध कैसे पिएगा, अर्थात् आयु अनुसार दूध की मात्रा बढ़ाई नहीं जा सकती है।

 

अक्सर बोतल छुड़ाने पर बच्चे दूध पीना कम कर देते हैं, कभी कभी बंद भी कर देते हैं और माता पिता घबरा जाते हैं कि शिशु भूखा रह जाएगा, लेकिन चिंतित न हों, दूध पीना कम करेगा तो खाना खाएगा। इस दुनिया में खाली पेट कौन रह सकता है? जब हमें भूख लगती है, बासी रोटी पकवान नजर आती है। भरे पेट पकवानों की कोई अहमियत नहीं है। 'भूख न देखे जूठा भात, प्यास न देखे धोबी घाट, नींद न देखे टूटी खाट'

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