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Thursday, July 16, 2020

आखिर सरकारी योजनाओं के सफल न होने पाने के पीछे क्या कारण है ???

Goverment_scheme
आखिर मोदी के विचारों की असफलता के पीछे कौन है ?

क्यों अच्छी योजनाएं सफल नहीं हो पातीं।

हमारे माननीय प्रधानमंत्री के समक्ष है, जिसका वे सामना कर रहे हैं? यह बिल्कुल कॉर्पोरेट जैसी समस्या है, जिससे आज हमारा देश गुजर रहा है। स्वच्छ भारत योजना से लेकर जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर), रेरा (भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ) या बीस लाख करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज तक, सभी की मंशा अच्छी थी और सभी की शुरुआत देशहित में की गई। लेकिन बात जब जमीनी स्तर पर इनके क्रियान्वयन की आती है तो हमें बड़ी असफलता नजर आती है।ऐसा क्यो?

ऐसा लगता है कि जैसे सभी योजनाएं बहुत धीरे-धीरे ऊपर से नीचे पहुंच रही हैं। जमीनी स्तर पर कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा, शायद इसलिए क्योंकि जब किसी विचार या योजना की कल्पना की जा रही है, तो उसमें साझेदारों को शामिल नहीं किया जा रहा, उनसे क्रियान्वयन में आने वाले व्यवधानों पर चर्चा नहीं हो रही, जमीनी चुनौतियों को नहीं समझा जा रहा है। शायद कॉर्पोरेट ऑफिस (इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय) सिर्फ सीईओ से बातकर चीजें तय कर रहा है और फिर योजना तैयार कर क्रियान्वयन के लिए नीचे भेज दी जा रही है।

एक भी योजना जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू नहीं हुई, यहां तक की भाजपा शासित राज्यों में भी नहीं। जैसे स्वच्छ भारत योजना तहत मध्य प्रदेश के इंदौर शहर ने बेहतरीन प्रदर्शन किया लेकिन न ही प्रदेश की राजधानी भोपाल और न ही किसी भी भाजपा शासित राज्य का कोई भी शहर इस प्रदर्शन को दोहरा पाया। ऐसा क्यों?

कोई भी केस स्टडी साझा क्यों नहीं की गई, विशेष ड्यूटी में लगे अधिकारियों ने अपनी योजना, अपना ज्ञान अन्य राज्यों या अन्य शहरों को क्यों नहीं दिया?

अगर यह मोदी का विचार था कि 20 लाख करोड़ के पैकेज से अर्थव्यवस्था को उबारने का प्रयास किया जाए, तो किसने इसे निष्फल बनाने का फैसला लिया?

20 लाख करोड़ के पैकेज का डंका तो खूब पिटा पर भारत के अलावा किसी और देश या विशेष व्यक्ति समूह या फिर दुनिया में एक भी बड़े अर्थशास्त्री ने इसकी तारीफ या सराहना नहीं की केवल भारत सरकार के वित्तमंत्री और नेताओं को छोड़कर। यह सामान्य बोध की बात थी कि हमें मध्यम और निम्न वर्ग के हाथों में पैसा देने की जरूरत है ताकि लोग आगे आएं और विकास का चक्का चलाएं।लेकिन वित्तमंत्री और उनके अर्थशास्त्री इस बात को समझ नहीं पाए।

 

 यह स्पष्टरूप से जमीनी स्तर पर जिम्मेदारी न लेने का मामला है और क्योंकि इसमें लोगों को शामिल नहीं किया गया, जैसा कि किसी कॉर्पोरेट में भी होता है, जहां संबंधित लोगों से चर्चा किए बिना और उनकी भौगोलिक स्थिति समझे बिना योजना बना दी जाती है। इस तरह बिना किसी निगरानी या उत्तरदायित्व के योजना का क्रियान्वयन जमीन पर मौजूद कर्मचारियों पर छोड़ दिया जाता है।

बात जब उत्तरदायित्व की हो रही है तो मैं यह सोच रहा था कि आप जब किसी योजना की शुरुआत करते हैं तो क्या इसका तरीका भी तय करते हैं कि योजना की सफलता को कैसे मापा जाएगा? क्योंकि आपने उस योजना के लिए एक राशि का आवंटन किया है, तो आप उसकी किसी भी प्राइवेट कंपनी में एक सीईओ अपना मोल या योग्यता 6 साल में साबित न कर पाए, तो उसे और कितना वक्त दिया जाता है? क्या यह सीईओ के प्रबंधन की शैली है या ब्यूरोक्रेसी को संभालने में अनुभव की कमी? या आखिर क्यों मोदी के सारे मंत्री और नौकरशाह मोदी की वह करने में मदद नहीं कर रहे हैं, जिसे वे क्रियान्वित करना चाहते हैं?

इस पूरी प्रक्रिया में मेरा कहने का उद्देश्य बस इतना सा है की शासन की कोई भी योजनाये आये चाहे देश सुधार नीति हो या फिर देश की जनता को फाइनेंसियल हेल्प करना , या फिर जैसा आप उन्हें अपने पैरो में खड़े कर आत्मनिर्भर करना चाहते है। आपकी नीति सही हो सकती है पर प्लानिंग और इम्प्लीमेंटेशन में अंतर है जिससे जनता त्रस्त है।

और यह भी देखना बहुत जरुरी है की यदि जनता की मदद हो या न हो पर उनके ऊपर कर्जा और भखे मरने का विकल्प न बस रह जाये। क्योकि डगर कठिन है सब अच्छा रहा तो निच्छित ही आपका यश देश दुनिया में फैलेगा परन्तु यदि असफल रहे तो वही लोगो के सामने आप गिर जायेंगे। क्योकि यहाँ वन साइडेड डिसिशन नहीं लिया जा सकता प्रोस  एंड  कोन्स  दोनों देखना पड़ता है।

यह मेरी अपनी सोच है सब लोगो की सोच अलग अलग हो सकती है यदि आपको भी कुछ साझा करना होतो हमें कमेंट बॉक्स में कमेंट करें।


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