Translate

Tuesday, March 31, 2020

बच्चो में लक्षण अंगूठा चूसना ,नींद में पेशाब,एलर्जी व श्वास रोग



cute baby thumb sucking
अंगूठा चूसना ,नींद में पेशाब,एलर्जी व श्वास रोग 

दोस्तों आज हम बच्चो के कुछ सामान्य लक्षण के बारे में पढ़ते है ,समझते है और उसे रोकने के सुझाव व उपचार  :-

1. बच्चो का अंगूठा चूसना 

2. बच्चो का पेशाब में नियंत्रण न होना 

3. एलर्जी एवं स्वास रोग सम्बन्धी 

  •  बच्चो का अगूठा चूसना :


मानव मनोवैज्ञानिक विकास का पहला चरण मुख अवस्था है, जिसमें शिशु हर चीज उठाकर
मुँह में डालता है, इसी के तहत अंगूठा चूसने की आदत हो जाती है।
इसके सामान्य कारण भूख,असुरक्षा और अकेलापन है। अपने सामाजिक परिवेश में माँ के सानिध्य में शिशु भूखा नहीं रह पाता, समस्त परिवारजनों के आसपास रहने से असुरक्षा भी नहीं होती लेकिन जैसे ही अकेलापन हावी होता है,अगूठा चूसने लगता है। एक वर्ष की आयु से पूर्व उससे नजरें मिलाकर लगातार बातें करने से, घूमते हुए झूमरदार खिलौनों के माध्यम से इस आदत को आसानी से अंगूठा चूसना छुडाया जा सकता है  

एक वर्ष के बाद इस छुड़ाना कठिन हो जाता है। दिन के वक्त वह हमारा सब कहना मानता है, लेकिन टीवी पर अपने काटून धारावाहिक देखते समय, सोते समय अंगूठा चूसे बिना नहीं रह पाता है, इसे अनुशासन का मुद्दा न बनाएँ। इसे रोकने के लिए अंगूठे पर मिर्ची, मेथी अथवा कड़वी दवाइयाँ लगाना निश्चय ही भूल है,क्योंकि आज हम इतने बड़े होकर अपनी गंदी आदतें तो नहीं सुधार सके, बेचारे बालक से अपेक्षा करना नाइंसाफी है।

छह वर्ष की आयु के बाद उसे उसके बड़े होने का एहसास कराकर इसे छुड़ाया जा सकता
है, कि तुम अब बड़े हो गए हो, यह तो छोटों का काम है जो नहीं समझते, देखो, तुम्हारे मित्र, शिक्षिकाएँ कोई अंगूठा नहीं चूसता है।

  • नींद में बिस्तर में पेशाब होना :


छोटा नादान शिशु यह नहीं समझता कि शौच अन्यत्र किया जाता है। जब वह बड़ा होता है,
सबको शौचालय जाते हुए देखता है, समझने लगता है कि कहीं भी करना ठीक नहीं है, तब वह भी शौचालय जाने लगता है। उसके इस कार्य की सराहना करें और यदि नहीं भी जाता तो डराने धमकाने का सहारा न लें क्योंकि इससे समस्या घटने की बजाय बढ़ने का अंदेशा रहता है।
यह कहावत दहशत में पेशाब हो गई' यथार्थ है, कोई अतिश्योक्ति नहीं है। सामान्यतया बच्चा ढाई वर्ष की आयु तक दिन में हर बार शौचालय जाने लगता है और 3 वर्ष की उम्र तक रात्रि में भी उठकर शौचालय जाने लगता है।

इसके बाद भी कभी कभी इस प्रक्रिया में बच्चे का नियंत्रण नहीं रहता और नींद में ही बिस्तर में पेशाब हो जाती है। यह बीमारी नहीं है, अपितु पेशाब नियंत्रण संचार व्यवस्था की परिपक्वता में देरी की वजह से होती है।

शौच क्रियाओं में नियंत्रण, मुट्ठी में पकड़ी रेत के समान है जिसे यदि जोर से पकड़ने
का प्रयास किया जाए तो गिरने की पूरी संभावना रहती है। अत: इसमें बच्चों को डाँट फटकार की जरूरत नहीं है, बल्कि उसका मानसिक संबल बढ़ाएँ, उसे आपके सहयोग की आवश्यकता है क्योंकिवह जानबूझकर ऐसा नहीं करता है।

हमारे शरीर में पेशाब बनना चौबीस घंटे की प्रक्रिया है, यह बनकर पेशाब की थैली में जमा होती रहती है। जब यह मात्रा लगभग 700 मि.ली. तक होती है, तब आभास होता है कि शौचालय जाना चाहिए लेकिन यदि हम किन्हीं कारणोंवश नहीं जा सकते या नहीं जाना चाहते तब मस्तिष्क का संकेत आ जाता है और हम एक से 1.5 लीटर तक रोक सकते हैं। इन बच्चों में रात को सोते समय जब मस्तिष्क का नियंत्रण नहीं रहता तो जैसे ही 700 मि.ली. पेशाब जमा होती है, बिस्तर में निकल जाती है।

इसलिए अतिरिक्त पेय पदार्थ जैसे फलों का रस, शरबत, शीतल पेय, आइसक्रीम, सोते वक्त का एक गिलास दूध शाम 6 बजे से पहले ही समायोजित करें जिससे डन द्रवों से जितनी पेशाब बननी है, बन जाए। खाने के साथ पानी पर बंदिश न लगाएँ। सोने से पहले शिशु को शौचालय ले जाएँ जिससे मूत्र थैली खाली हो जाए तथा यदि माताएँ जल्दी उठ जाती हैं तो उठाकर पेशाब फिर करा दें।

अतः हम यह चाहते हैं कि पूरी रात में 700 मि.ली.से अधिक पेशाब न बनने पाए। यदि 6 वर्ष की आयु के बाद भी यह प्रक्रिया जारी रहती है, तब चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।

  • एलर्जी और श्वास रोग :


आधुनिकीकरण और बढ़ते प्रदूषण के वर्तमान दौर में एलजी और श्वास रोगों की संख्या में
निरंतर वृद्धि हो रही है। बार बार श्वास फूलना, पराली चलना, सांस लेने में सीटी जैसी आवाज आना,दौड़ने, सीढ़ी चढ़ने पर बार बार खाँसी आना इसके लक्षण हैं, इन पर पंप और नेब्यूलाइजर से आसानी से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। नेल्यूलाइजर में बिजली की आवश्यकता होती है, जबकि पंप कहीं भी उपयोग किया जा सकता है, बिजली की आवश्यकता नहीं होती। दोनों का प्रभाव और लाम बराबर है।

जिन बच्चों को यह तकलीफ होती है, उनके लिए इनका उपयोग जरूरी है। यह केवल भाति है कि इनसे फेफड़े कमजोर हो जाते हैं, इनसे निकलने वाली दवा की ठंडी भाप नुकसानदेय हो सकती है,इनके उपयोग के बाद अन्य दवाईयाँ असरकारक नहीं रहती, ये आखिरी सहारा है, इनकी आदत बन जाती है जो जीवन भर नहीं छूटती।

यह बीमारी अक्सर मौसम के परिवर्तन से होती है, इन बच्चों के लिए सितंबर, अक्टूबर और
फरवरी, मार्च के महिने कष्टदायक होते हैं। इस बीमारी का सामान्यतः किसी खाने की चीज से संबंध नहीं रहता है। धूल, धुंआ, परागकण, तेज सुगंध के सेंट, अगरबत्तियाँ, पेन्ट, वार्निश की गंध, दीवारों पर जमी सीलन और पपड़ी की फफूंद, खाने में मिलाए कृत्रिम रंग, गाड़ियों से उत्सर्जित काला धुंआ, कीटनाशक दवाइयों का धुंआ और छिड़काव, पालतू जानवरों के बाल, कालीन, फोटो, आलमारियों के पीछे की पुरानी धूल (गरदा) से यह परेशानी बढ़ सकती है, अतः इनसे बचें।

दीवाली पर हवा की दिशा के अनुसार खड़े होकर फटाके चलाएँ जिससे फटाकों का धुंआ श्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट न हो सके, यह भी परेशानी का कारण बन सकता है।
सामान्यतः बच्चों की सी खाँसी 3 से 5 दिन में बिना दवाईयों के अपने आप ठीक हो जाती है।
लेकिन इन बच्चों को सुबह छींक आती है, शाम तक खाँसी चलने लगती है, अगले दिन सुबह खाँसी और तेज हो जाती है और शाम तक पसली चलने लगती है, यानी मात्र 24 से 48 घण्टे में मामूली सी तेज पसली चलने का रूप ले लेती है, फिर बच्चा न भरपेट भोजन ग्रहण कर पाता है और न ही ठीक से सो पाता है। एक माह में बालक का तिल तिल करके जो वजन बढ़ता है, 3 दिन की बीमारी में घट जाता है।

अत: इन बच्चों को जैसे ही सर्दी शुरु हो, तुरंत नेब्युलाइज कर जिससे शीघ्र नियंत्रण हो और बीमारी बढ़ने न पाए। इन बच्चों की यह परेशानी 5 वर्ष की आयु होते तक अक्सर अपने आप समाप्त हो जाती है।

हम सभी दवाइयाँ मिलीग्राम मात्रा में गोली के रूप में लेते हैं, तब वह अवशोषित होकर खून में
माइक्रोग्राम में प्रवाहित होती है और शरीर के हर उस हिस्से में पहुँचती है, जहाँ भी रक्त का संचार होता है। इस समय दवा की आवश्यकता केवल फेफड़ों में है, बाकी शरीर में पहुँची दवा की कोई उपयोगिता नहीं है।

नेब्यूलाइजेशन माइक्रोग्राम में दवा जल्दी से फेफड़ों में पहुँचाने का आसान, असरकारक और
विश्वसनीय माध्यम है, जिससे पूरे शरीर को बाईपास करके दवा सीधे फेफड़ों तक पहुँच जाती है, इसका असर तत्काल देखा परखा जा सकता है कि नेब्यूलाइजर में दवा खत्म नहीं हो पाती खाँसी कम हो जाती है, बच्चा आराम से सो जाता है, हमको भी आराम मिल जाता है क्योंकि बच्चे के खाँसते ही सबकी नींद खुल जाती है। यह संभव नहीं है कि बच्चा खाँसता रहे और सब सोते रहें।

अतः गोली खाने से दवा की जितनी मात्रा मिलीग्राम में एक सप्ताह में शरीर में प्रविष्ट होती है उतनी दवा में हम महीने भर तक नेब्यूलाइज कर सकते हैं अर्थात कम दवा की मात्रा में जल्द ही बेहतर नियंत्रण और पूरा आराम, तो निश्चय ही हम इसे पसंद करेंगे।

हमारे जीवन में दवाइयों की उपयोगिता कष्ट, दर्द निवारण के लिए है जिससे जीवन सुखमय
बना रहे। शरीर में दवा पहुँचाने का माध्यम बीमारी अनुसार निर्धारित किया जाता है। जब कोई दर्द से बहुत बेचैन रहता है, नस में ड्रिप द्वारा दवा देते हैं जिससे जल्दी आराम हो सके। गोली के रूप में दवा लेने पर अवशोषित होकर रक्त द्वारा पहुँचेगी फिर असर करेगी, इसमें वक्त लगेगा, बच्चा दर्द से तड़पेगा।

तब यह सोचना तर्कविहीन है कि गोली खाएँगे, इन्जेक्शन नहीं लगवाएँगे। इसी प्रकार यह
सोचिए कि पाखाना न होने के कष्ट से पीड़ित को एनीमा नहीं लगाएँ, केवल गोली खिलाएँ,एनीमा देने से घंटे भर के अंदर पाखाना हो जाएगा और गोली का असर होने में 8-10 घंटे का वक्त लगेगा और उतनी देर वह दुखी रहेगा,तब गोली की जिद पर अड़े रहने का कोई औचित्य नहीं है।

इन उदाहरणों का आशय यह है कि इन बच्चों को जैसे ही परेशानी शुरु हो, तरंत नेब्युलाइजर
का उपयोग करें खाने की दवाईयों की जिद न करें। हम सब बतलाते, समझाते हैं लेकिन जैसे ही कोई मित्र,पडोसी,रिश्तेदार कहता है, अरे ये क्या कर रहे हो? इससे नुकसान होता है, भयवश नेब्युलाइजर का उपयोग बंद कर देते हैं। हमारे समझाने पर एक क्षण में पानी फिर जाता है और परेशान केवल बच्चा होता है। घर में नेब्यूलाइजर होते हुए भी इसका उपयोग न करना उसी प्रकार है कि घर में बढ़िया मोटरसाइकिल है और पदल घूम रहे हैं, फिर कहते हैं, थके जा रहे हैं, तो इस समस्या का क्या हल है?
ठाठ से गाड़ी चालू करें, घूमें। यानी निर्देशानुसार नेब्यूलाइज करें, जिससे बीमारी नियंत्रण में रहे । बालक शाला से अनुपस्थित न रहे और अपने साथियों के समान खेले, कूदे, दौड़े, ऊधम मचाए अर्थात् उसकी दिनचर्या बाधित न हो और कोई पाबंदी भी न रहे, यही हमारा उद्देश्य है।


No comments:

Post a Comment

गरीब,लावारिस व असहायों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । (Part-01)

गरीब,लावारिस व असहाय लोगों का मसीहा - मोक्ष संस्थापक श्री आशीष ठाकुर । छू ले आसमां जमीन की तलाश ना कर , जी ले जिंदगी ख़ुशी की तलाश ना कर , ...